थावरकायप्पहुदी, अणियट्टीवितिचउत्थभागो त्ति।
कोहतियं लोहो पुण, सुहमसरागो त्ति विण्णेयो॥686॥
अन्वयार्थ : कषायमार्गणा की अपेक्षा क्रोध, मान, माया ये तीन कषाय स्थावरकाय मिथ्यादृष्टि से लेकर अनिवृत्तिकरण के दूसरे, तीसरे, चौथे भाग तक क्रम से रहते हैं और लोभकषाय दशवें सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तक रहता है। अतएव आदि के तीन कषायों में गुणस्थान नव और लोभकषाय में दश होते हैं, किन्तु जीवसमास दोनों जगह चौदह-चौदह ही होते हैं ॥686॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका