
थावरकायप्पहुदी, मदिसुदअण्णाणयं विभंगो दु।
सण्णीपुण्णप्पहुदी, सासणसम्मो त्ति णायव्वो॥687॥
अन्वयार्थ : ज्ञानमार्गणा में कुमति और कुश्रुत ज्ञान स्थावरकाय मिथ्यादृष्टि से लेकर सासादन गुणस्थान तक होते हैं। विभमज्ञान संज्ञी पर्याप्त मिथ्यादृष्टि से लेकर सासादनपर्यन्त होता है। कुमति, कुश्रुत ज्ञान में गुणस्थान दो और जीवसमास चौदह होते हैं। विभम में गुणस्थान दो और जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही होता है ॥687॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका