
चउरक्खथावराविरदसम्माइट्ठी दु खीणमोहो त्ति।
चक्खुअचक्खू ओही, जिणसिद्धे केवलं होदि॥691॥
अन्वयार्थ : दर्शनमार्गणा में चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रिय से लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है और अचक्षुदर्शन स्थावरकाय से लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है। तथा अवधिदर्शन अव्रतसम्यग्दृष्टि से लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है। केवलदर्शन सयोगकेवली और अयोगकेवली इन दो गुणस्थानों में और सिद्धों के होता है ॥691॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका