
तिरियगदीए चोद्दस, हवंति सेसेसु जाण दो दो दु।
मग्गणठाणस्सेवं, णेयाणि समासठाणाणि॥700॥
अन्वयार्थ : मार्गणास्थान के जीवसमासों को संक्षेप से इसप्रकार समझना चाहिये कि तिर्यग्गति मार्गणा में तो चौदह जीवसमास होते हैं और शेष समस्त गतियों में संज्ञी पर्याप्त, अपर्याप्त ये दो-दो ही जीवसमास होते हैं। शेष मार्गणास्थानों में यथायोग्य पूर्वोक्त क्रमानुसार जीवसमास घटित कर लेने चाहिये ॥700॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका