
मिच्छे चोद्दस जीवा, सासण अयदे पमत्तविरदे य।
सण्णिदुगं सेसगुणे, सण्णीपुण्णो दु खीणोत्ति॥699॥
अन्वयार्थ : मिथ्यात्वगुणस्थान में चौदह जीवसमास हैं। सासादन, असंयत, प्रमत्तविरत और मचङ्क शब्द से सयोगकेवली इनमें संज्ञी पर्याप्त, अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते हैं। शेष क्षीणकषाय गुणस्थान पर्यन्त आठ गुणस्थानों में तथा मतुङ्क शब्द से अयोगकेवली गुणस्थान में संज्ञी पर्याप्त एक ही जीवसमास होता है ॥699॥ नोट - गाथा नं. 695 की टीका में सासादनमार्गणा में सात भी जीवसमास बताये हैं।
जीवतत्त्वप्रदीपिका