तिसु तेरं दस मिस्से, सत्तसु णव छट्ठयम्मि एयारा।
जोगिम्मि सत्त जोगा, अजोगिठाणं हवे सुण्णं॥704॥
अन्वयार्थ : मिथ्यादृष्टि, सासादन, असंयत इन तीन गुणस्थानों में पन्द्रह योगों में से आहारक, आहारकमिश्र को छोड़कर शेष तेरह योग होते हैं। मिश्रगुणस्थान में उक्त तेरह योगों में से औदारिकमिश्र, वैक्रियिकमिश्र, कार्मण इन तीनों के घट जाने से शेष दश योग होते हैं। इसके ऊपर छट्ठे गुणस्थान को छोड़कर सात गुणस्थानों में नव योग होते हैं, क्योंकि उक्त दश योगों में से एक वैक्रियिक योग ओर भी घट जाता है किन्तु छट्ठे गुणस्थान में ग्यारह योग होते हैं, क्योंकि उक्त नव योगों में आहारक, आहारकमिश्र ये दो योग मिलते हैं। सयोगकेवली में सात योग होते हैं। अयोगकेवली के कोई भी योग नहीं होता ॥704॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका