
सण्णी ओघे मिच्छे, गुणपडिवण्णे य मूलआलावा।
लद्धियपुण्णे एक्कोऽपज्जत्तो होदि आलाओ॥720॥
अन्वयार्थ : संज्ञी जीव के जितने गुणस्थान होते हैं उनमें से मिथ्यादृष्टि या विशेष गुणस्थान को प्राप्त होने वाले के मूल के समान ही आलाप समझने चाहिये और लब्ध्यपर्याप्तक संज्ञी के एक अपर्याप्त ही आलाप होता है ॥720॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका