ओघे आदेसे वा, सण्णीपज्जंतगा हवे जत्थ।
तत्थ य उणवीसंता, इगिवितिगुणिदा हवे ठाणा॥727॥
अन्वयार्थ : सामान्य (गुणस्थान) या विशेषस्थान में (मार्गणास्थान में) संज्ञी पंचेन्द्रियपर्यन्त मूलजीवसमासों का जहाँ निरूपण किया है वहाँ उत्तर जीवसमासस्थान के भेद उन्नीसपर्यन्त होते हैं और इनका भी एक, दो, तीन के साथ गुणा करने से क्रम से उन्नीस, अड़तीस और सत्तावन जीवसमास के भेद होते हैं ॥727॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका