वीरमुहकमलणिग्गयसयलसुयग्गहणपयडणसमत्थं।
णमिऊणगोयममहं, सिद्धंतालावमणुवोच्छं॥728॥
अन्वयार्थ : अंतिम तीर्थंकर श्री वर्धमानस्वामी के मुखकमल से निर्गत समस्त श्रुतसिद्धान्त के ग्रहण करने और प्रकट करने में समर्थ श्री गौतमस्वामी को नमस्कार करके मैं उस सिद्धान्तालाप को कहूँगा जो वीर भगवान के मुखकमल से उपदिष्ट श्रुत में वर्णित समस्त पदार्थों के प्रकट करने में समर्थ है॥728॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका