
विदियुवसमसम्मत्तं, सेढीदोदिण्णि अविरदादीसु।
सगसगलेस्सामरिदे, देवअपज्जत्तगेव हवे॥730॥
अन्वयार्थ : उपशम श्रेणी से संक्लेश परिणामों के वश से नीचे असंयतादि गुणस्थानों में उतरे हुए असंयतादि अपनी-अपनी लेश्या में यदि मरते हैं तो नियम से अपर्याप्त असंयत देव होते हैं। उनमें द्वितीयोपशम सम्यक्त्व सम्भव है, इसलिये वैमानिक अपर्याप्त देव में उपशमसम्यक्त्व कहा है। चार गति में से एक देव अपर्याप्त को छोड़कर अन्य किसी भी गति की अपर्याप्त अवस्था में द्वितीयोपशम सम्यक्त्व नहीं होता॥730॥
जीवतत्त्वप्रदीपिका