मणपज्‍जवपरिहारो, पढमुवसम्मत्त दोण्णि आहारा।
एदेसु एक्‍कपगदे, णत्थित्ति असेसयं जाणे॥729॥
अन्वयार्थ : मन:पर्ययज्ञान, परिहारविशुद्धि संयम, प्रथमोपशम सम्यक्‍त्व और आहारकद्वय इनमें से किसी भी एक के होने पर शेष भेद नहीं होते, ऐसा जानना चाहिये ॥729॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका