गुणजीवठाणरहिया, सण्णापज्‍जत्तिपाणपरिहीणा।
सेसणवमग्गणूणा, सिद्धा सुद्धा सदा होंति॥732॥
अन्वयार्थ : सिद्ध परमेष्ठी - चौदह गुणस्थान, चौदह जीवसमास, चार संज्ञा, छह पर्याप्‍ति, दश प्राण इनसे रहित होते हैं। तथा इनके सिद्धगति, ज्ञान, दर्शन, सम्यक्‍त्व और अनाहार को छोड़कर शेष नव मार्गणा नहीं पाई जातीं और ये सिद्ध सदा शुद्ध ही रहते हैं, क्योंकि मुक्तिप्राप्‍ति के बाद पुन: कर्म का बंध नहीं होता॥732॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका