
संजलणं पुवेयं हस्सादीणोकसायछक्कं च ।
णियएक्कजोग्गसहिया वारस आहारगे जुम्मे ॥४२॥
संज्वलनं पुंवेदं हास्यादिनोकषायषट्कं च ।
निजैकयोगसहिता द्वादश आहारके युग्मे ॥
अन्वयार्थ : आहारक काययोग में चार संज्वलन, पुरुषवेद, हास्यादि नो कषाय छह और आहारक योग ये १२ आस्रव होते हैं, ये ही बारह आहारकमिश्र में होते हैं केवल योग के स्थान में आहारक निकालकर आहारकमिश्र कर दीजिये ॥४२॥
आहारकद्विक में छठा गुणस्थान ही होता है उसमें १२ आस्रव हैं ।