ओरालं तंमिस्सं कम्मइयं सच्चअणुभयाणं च ।
मणवयणाण चउक्के केवलणाणे सगं जाणे ॥४९॥
औदारिकं तन्मिश्रं कार्मणं सत्यानुभयानां च ।
मनोवचनानां चतुष्कं केवलज्ञाने सप्त जानीहि ॥
अन्वयार्थ : केवलज्ञान में औदारिक, औदारिकमिश्र, कार्मण, सत्य मनोयोग, अनुभय मनोयोग, सत्यवचनयोग, अनुभयवचनयोग ये सात आस्रव होते हैं |
मन:पर्ययज्ञान में छठे से बारहवें गुणस्थान तक एवं केवलज्ञान में सयोगी, अयोगी होते हैं ।
केवलज्ञान में सयोगी के ७ योग हैं एवं इसी के अंत में व्युच्छित्ति होकर अयोगी योगरहित होते हैं ॥४९॥