
इदि मग्गणासु जोगो पच्चयभेदो मया समासेण ।
कहिदो सुदमुणिणा जो भावइ सो जाइ अप्पसुहं ॥६१॥
इति मार्गणासु योग्य: प्रत्ययभेदो मया समासेन ।
कथित: श्रुतमुनिना यो भावयति स याति आत्मसुखं ॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार से मार्गणाओं में योग्य आस्रव के भेदों को मुझ श्रुतमुनि ने संक्षेप से कहा है, जो भव्य जीव पठन, पाठन, मनन करके इसकी भावना करते हैं वे आत्मसुख को प्राप्त कर लेते हैं ॥६१॥