+ आहारक मार्गणा -
कम्मइयं वज्जित्ता छपण्णासा हवंति आहारे ।
तेदाला णाहारे कम्मइयरजोगपरिहीणा ॥६०॥
कार्मणं वर्जायित्वा षट्पंचाशद्भवन्त्याहारे ।
त्रिचत्वारिंशदनाहारे कार्मणेतरयोगपरिहीना: ॥
अन्वयार्थ : आहारक अवस्था में कार्मण योग को छोड़कर ५६ आस्रव होते हैं । अनाहारक अवस्था में कार्मणयोग के सिवाय चौदह योगों से रहित ४३ आस्रव होते हैं । आहारक में पहले से लेकर तेरह तक गुणस्थान होते हैं । अनाहारक में प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ और सयोगी ये गुणस्थान होते हैं ॥६०॥