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रेवती रानी की कथा

  कथा 

कथा :

संसार का हित करने वाले जिनभगवान् को परम भक्तिपूर्वक नमस्‍कार कर अमूढ़दृष्टि अंग का पालन करने वाली रेवती रानी की कथा लिखता हूँ ।

विजयार्ध पर्वत की दक्षिणश्रेणी में मेघकूट नाम का एक सुन्‍दर शहर है । उसके राजा हैं चन्‍द्रप्रभ । चन्‍द्रप्रभ ने बहुत दिनों तक सुख के साथ अपना राज्‍य किया । एक दिन वे बैठे हुए थे कि एकाएक उन्‍हें तीर्थयात्रा करने की इच्‍छा हुई । राज्‍य का करोबार अपने चन्‍द्रशेखर नाम के पुत्र को सौंपकर वे तीर्थयात्रा के लिये चल दिये । वे यात्रा करते हुए दक्षिण मथुरा में आये । उन्‍हें पुण्‍य से वहाँ गुप्‍ताचार्य के दर्शन हुए । आचार्य से चन्‍द्रप्रभ ने धर्मोपदेश सुना । उनके उपदेश का उन पर बहुत असर पड़ा । वे आचार्य के द्वारा--

प्रोक्‍त: परोपकारो अत्र महापुण्‍याय भूतले । --ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात परोपकार करना महान् पुण्‍य का कारण है, यह जानकर और तीर्थयात्रा करने के लिये एक विद्या का अपने अधिकार में रखकर क्षुल्‍लक बन गये ।

एक दिन उनकी इच्‍छा उत्‍तर मथुरा की यात्रा करने की हुई । जब वे जाने को तैयार हुए तब उन्‍होंने अपने गुरू महाराज से पूछा-- हे दया के समुद्र, मैं यात्रा के लिये जा रहा हूँ, क्‍या आपको कुछ समाचार तो किसी के लिये नहीं कहना है ? गुप्‍ताचार्य बोले— मथुरा में एक सूरत नाम के बड़े ज्ञानी और गुणी मुनिराज हैं, उन्‍हें मेरा नमस्‍कार कहना और सम्‍यग्‍दृष्टिनी धर्मात्‍मा रेवती लिये मेरी धर्मवृद्धि कहना ।

क्षुल्‍लक ने और पूछा कि इसके सिवा और भी आपको कुछ कहना है क्‍या ? आचार्य ने कहा- नहीं । तब क्षुल्‍लक ने विचारा कि क्‍या कारण है जो आचार्य ने एकादशांग के ज्ञाता श्रीभव्‍यसेन मुनि तथा और-और मुनियों को रहते उन्‍हें कुछ नहीं कहा और केवल सूरत मुनि और रेवती के लिये ही नमस्‍कार किया तथा धर्म वृद्धि दी? इसका कोई कारण अवश्‍य होना चाहिये । अस्‍तु । जो कुछ होगा वह आगे स्‍वयं मालूम हो जायेगा । यह सोचकर चन्‍द्रप्रभ क्षुल्‍लक वहाँ से चल दिये । उत्तर मथुरा पहुँचकर उन्‍होंने सूरत मुनि को गुप्‍ताचार्य की वन्‍दना कह सुनाई । उससे सूरत मुनि बहुत प्रसन्‍न हुए । उन्‍होंने चन्‍द्रप्रभ के साथ खूब वात्‍सल्‍य का परिचय दिया । उससे चन्‍द्रप्रभ को बड़ी खुशी हुई । बहुत ठीक कहा है-

ये कुर्वन्ति सुवात्‍सल्‍यं भव्‍या धर्मानुरागत: ।

साधर्मिकेषु तेषां हि सफलं जन्‍म भूतले ।। --ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्— संसार में उन्‍हीं का जन्‍म लेना सफल है जो धर्मात्‍माओं से वात्‍सल्‍य प्रेम करते हैं ।

इसके बाद क्षुल्‍लक चन्‍द्रप्रभ एकादशांग के ज्ञाता, पर नाम मात्र के भव्‍यसेन मुनि के पास गये । उन्‍होंने भव्‍यसेन को नमस्‍कार किया | पर भव्‍यसेंन मुनि ने अभिमान में आकर चन्‍द्रभप्र को धर्मवृद्धि तक भी न दी । ऐसे अभिमान को धिक्‍कार है ! जिन अविचारी पुरूषों के वचनों में भी दरिद्रता है जो वचनों से भी प्रेम पूर्वक आये हुए अतिथि से नहीं बोलते— वे उनका और क्‍या सत्‍कार करेंगे ? उनसे तो स्‍वप्‍न में भी अतिथिसत्‍कार नहीं बन सकेगा । जैन शास्‍त्रों का ज्ञान सब दोषों से रहित है, निर्दोष है । उसे प्राप्‍त कर हृदय पवित्र होना ही चाहिए । पर खेद है कि उसे पाकर भी मान होता है । पर यह शास्‍त्र का दोष नहीं, किन्‍तु यों कहना चाहिए कि पापियों के लिए अमृत भी विष हो जाता है । जो हो, तब भी देखना चाहिए कि इन में कुछ भी भव्‍यपना है भी, या केवल नाम मात्र के ही भव्‍य हैं ? यह विचार कर दूसरे दिन सबेरे जब भव्‍यसेन कमण्‍डलु लेकर शौच के लिये चले तब उनके पीछे-पीछे चन्‍द्रप्रभ क्षुल्‍लक भी हो लिए । आगे चलकर क्षुल्‍लक महाशय ने अपने विद्या बल से भव्यसेन के आगे की भूमि को कोमल और हरे-हरे तृणों से युक्‍त कर दिया । भव्‍यसेन उसकी कुछ परवा न कर और यह विचार कर कि जैनशास्त्रों में तो इन्‍हें एकेन्‍द्री कहा है, इनकी हिंसा का विशेष पाप नहीं होना, उसपर से निकल गए । आगे चलकर जब वे शौच हो लिए और शुद्धि के लिए कमण्‍डलु की ओर देखा तो उसमें जल नहीं और वह औंधा पड़ा हुआ है, तब तो उन्‍हें बड़ी चिन्‍ता हुई । इतने में एकाएक क्षुल्‍लक महाशय भी उधर आ निकले । कमण्‍डलु का जल यद्यपि क्षुल्‍लकजी ने ही अपने विद्या बल से सुखा दिया था, तब भी वे बड़े आश्‍चर्य के साथ भव्‍यसेन से बोले - मुनिराज, पास ही एक निर्मल जल का सरोवर भरा हुआ है, वहीं जाकर शुद्धि कर लीजिए न ? भव्‍यसेन ने अपने पदस्थ पर, अपने कर्त्तव्‍य पर कुछ भी ध्‍यान न देकर जैसा क्षुल्‍लक ने कहा, वैसा ही कर लिया । सच बात तो यह है—

किं करोति न मूढ़ात्‍मा कार्यं मिथ्‍यात्‍वदूषित: ।

न स्‍यान्‍मुक्तिप्रदं ज्ञानं चरित्रं दुर्दशामपि ।

उद्गतो भास्‍करश्‍चापि किं घूकस्‍य सुखायते ।।

मिथ्‍यादृष्‍टे: श्रुतं शास्‍त्रं कुमार्गाय प्रवर्तते ।

यथा मृष्‍टं भवेत्‍कष्‍टं सुदुग्‍धं तुम्बिकागतम् ।। --ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-- मूर्ख पुरूष मिथ्‍यात्‍व के वश होकर कौन बुरा काम नहीं करते ? मिथ्‍यादृष्टियों का ज्ञान और चारित्र मोक्ष का कारण नहीं होता । जैसे सूर्य के उदय से उल्‍लू को कभी सुख नहीं होता । मिथ्‍यादृष्टियों का शास्‍त्र सुनना, शास्‍त्राभ्‍यास करना केवल कुमार्ग में प्रवृत होने का कारण है । जैसे मीठा दूध भी तूबड़ी के सम्‍बन्‍ध से कड़वा हो जाता है । इन सब बातों को विचार क्षुल्‍लक ने भव्‍यसेन के आचरण से समझ लिया कि ये नाम मात्र के जैनी हैं, पर वास्‍तव में इन्‍हें जैन धर्म पर श्रद्धान नहीं, ये मिथ्‍यात्‍वी हैं । उस दिन से चन्‍द्रप्रभ ने भव्‍यसेन का नाम अभव्‍यसेन रक्‍खा । सच बात है दुराचार से क्‍या नहीं होता ?

क्षुल्‍लक ने भव्‍यसेन की परीक्षा कर अब रेवती रानी की परीक्षा करने का विचार किया । दूसरे दिन उसने अपने विद्या बल से कमल पर बैठे हुए और वेदों का उपदेश करते हुए चतुर्मुख ब्रह्मा का वेष बनाया और शहर से पूर्व दिशा को ओर कुछ दूरी पर जंगल में वह ठहरा । यह हाल सुनकर राजा, भव्‍यसेन आदि सभी वहाँ गए और ब्रह्माजी को उन्‍होंने नमस्‍कार किया । उनके पावों पड़ कर वे बड़े खुश हुए । राजा ने चलते समय अपनी प्रिया रेवती से भी ब्रह्माजी की वन्‍दना के लिए चलने को कहा था पर रेवती सम्‍यक्त्व रत्‍न से भूषित थी, जिनभगवान् की अनन्‍यभक्‍त थी; इसलिये वह नहीं गई । उसने राजा से कहा-- महाराज, मोक्ष और सम्‍यग्‍दर्शन, सम्‍यग्‍ज्ञान तथा सम्‍यक्‍चारित्र को प्राप्‍त कराने वाला सच्‍चा ब्रह्मा जिनशासन में आदि जिनेन्‍द्र कहा गया है, उसके सिवा अन्‍य ब्रह्मा हो ही नहीं सकता और जिस ब्रह्मा की वन्‍दना के लिए आप जा रहे हैं, वह ब्रह्मा नहीं हैं; किन्‍तु कोई धूर्त ठगने के लिए ब्रह्मा का वेष लेकर आया है । मैं तो नहीं चलूँगी ।

दूसरे दिन क्षुल्‍लक ने गरूड़ पर बैठे हुए, चतुर्बाहु, शंख, चक्र, गदा आदि से युक्‍त और दैत्‍यों को कँपाने वाले वैष्‍णव भगवान् का वेष बनाकर दक्षिण दिशा में अपना डेरा जमाया ।

तीसरे दिन उस बुद्धिमान् क्षुल्‍लक ने बैल पर बैठे हुए, पार्वती के मुखकमल को देखते हुए, सिर पर जटा रखाये हुए, गणपति युक्‍त और जिन्‍हें हजारों देव आ आकर नमस्‍कार कर रहे हैं, ऐसा शिव का वेष धारण कर पश्चिम दिशा की शोभा बढ़ाई ।

चौथे दिन उसने अपनी माया से सुन्‍दर समवशरण में विराजे हुए, आठ प्रातिहार्यो से विभूषित, मिथ्‍यादृष्टियों के मान को नष्‍ट करने वाले मानस्‍तंभादि से युक्‍त, निर्ग्रन्थ और जिन्‍हें हजारों देव, विद्याधर, चक्रवर्ती आ आकर नमस्‍कार करते है, ऐसा संसार श्रेष्‍ठ तीर्थंकर का वेष बनाकर पूर्व दिशा को अलंकृत किया । तीर्थंकर भगवान् का आगमन सुनकर सबको बहुत आनन्‍द हुआ । सब प्रसन्‍न होते हुए भक्ति पूर्वक उनकी वन्‍दना करने को गये । राजा, भव्यसेन आदि भी उन में शामिल थे । तीर्थंकर भगवान के दर्शनों के लिये भी रेवती रानी को न जाती हुई देखकर सब को बड़ा आश्चर्य हुआ । बहुतों ने उससे चलने का आग्रह भी किया, पर वह न गई । कारण वह सम्यक्त्व रूप मौलिक रत्न से भूषित थी, उसे जिनभगवन के वचनों पर पूरा विश्वास था कि तीर्थंकर परम देव चौबीस ही होते हैं, और वासुदेव नौ और रुद्र ग्यारह होते हैं । फिर उनकी संख्या को तोड़ने वाले ये दशवें वासुदेव और बारहवें रुद्र और पच्चीसवें तीर्थंकर आ कहाँ से सकते हैं ? वे तो अपने-अपने कर्मों के अनुसार जहाँ जाना था वहाँ चले गये । फिर यह नई सृष्टि कैसी ? इनमें न तो कोई सच्चा रुद्र है, न वासुदेव, और न तीर्थंकर है, किंतु कोई मायावी ऐन्‍द्रजालिक अपनी धूर्तता से लोगों को ठगने के लिये आया है । यह विचार कर रेवती रानी तीर्थंकर की वन्दना के लिये भी नहीं गई । सच है कहीं वायु से मेरु पर्वत भी चला है ?

इसके बाद चन्द्रप्रभ, क्षुल्लक-वेश ही में, पर अनेक प्रकार की व्याधियों से युक्त तथा अत्यंत मलिन शरीर होकर रेवती के घर भिक्षा के लिये पहुँचे । आँगन में पहुँचते ही वे मूर्च्छा खाकर पृथ्वी पर धड़ाम से गिर पड़े । उन्हें देखते ही धर्म वत्सला रेवती रानी हाय-हाय कहती हुई उन के पास दौड़ी, इसके बाद अपने महल में ले जाकर बड़े कोमल और पवित्र भावों से उसने उन्हें प्रासुक आहार कराया । सच है जो दयावान होते हैं, उनकी बुद्धि दान देने को स्वभाव ही से तत्पर रहती है ।

क्षुल्लक को अब तक भी रेवती की परीक्षा से संतोष नहीं हुआ । सो उन्होंने भोजन करने के साथ ही वमन कर दिया, जिसमें अत्यंत दुर्गन्ध आ रही थी । क्षुल्लक की यह हालत देखकर रेवती को बहुत दुःख हुआ । उसने बहुत पश्चात्ताप किया कि न जाने क्या अपथ्य मुझ पापिनी के द्वारा दे दिया गया, जिससे इन की यह हालत हो गई । मेरी इस असावधानता को धिक्कार है । इस प्रकार बहुत पश्चात्ताप करके उसने क्षुल्लक का शरीर पोंछा और बाद कुछ-कुछ गरम जल से उसे धोकर साफ किया ।

क्षुल्लक रेवती की भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुए । वे अपनी माया समेट कर बड़ी खुशी के साथ रेवती से बोले- देवी, संसारश्रेष्ठ मेरे परम गुरु महाराज गुप्ताचार्य की धर्मवृद्धि तेरे मन को पवित्र करे, जो कि सब सिद्धियों की देने वाली है और तुम्हारे नाम से मैंने यात्रा में जहाँ-जहाँ जिनभगवान की पूजा की है वह भी तुम्हें कल्याण की देने वाली हो ।

देवी, तुमने जिस संसारश्रेष्ठ और संसार समुद्र से पार करने वाले अमूढ़दृष्टि अंग को ग्रहण किया है, उसकी मैंने नाना तरह से परीक्षा की, पर उसमें तुम्हें अचल पाया । तुम्हारे इस त्रिलोकपूज्य सम्यक्त्व की कौन प्रशंसा करने को समर्थ है ? कोई नहीं । इस प्रकार गुणवती रेवती रानी की प्रशंसा कर और उसे सब हाल कहकर क्षुल्लक अपने स्थान चले गए ।

इसके बाद वरुण नृपति और रेवती रानी का बहुत समय सुख के साथ बीता । एक दिन राजा को किसी कारण से वैराग्य हो गया । वे अपने शिव कीर्ति नाम के पुत्र को राज्य सौंपकर और सब मायाजाल तोड़कर तपस्वी बन गए । साधु बनकर उन्होंने खूब तपश्चर्या की और आयु के अंत में समाधि मरण कर वे माहेन्द्रस्वर्ग में जाकर देव हुए ।

जिनभगवान् की परम भक्त महारानी रेवती भी जिनदीक्षा ग्रहण कर और शक्ति के अनुसार तपश्चर्या कर आयु के अंत में ब्रह्मस्वर्ग में जाकर महर्द्धिक देव हुई ।

भव्य पुरुषों, यदि तुम भी स्वर्ग या मोक्ष सुख को चाहते हो, तो जिस तरह श्रीमती रेवती रानी ने मिथ्यात्व छोड़ा, उसी तरह तुम भी मिथ्यात्व को छोड़कर स्वर्ग-मोक्ष के देने वाले, अत्यंत पवित्र और बड़े-बड़े देव, विद्याधर, राजा-महाराजाओं से भक्ति पूर्वक ग्रहण किए हुए जैनधर्म का आश्रय स्वीकार करो ।