+ बौद्ध के यहाँ चतुष्कोटि विकल्प अवक्तव्य है -
चतुष्कोटेर्विकल्पस्य, सर्वान्तेषूक्त्ययोगत:
तत्त्वाऽन्यत्वमवाच्यं चेत्तयो: संतानतद्वतो: ॥45॥
अन्वयार्थ : [चेत् सर्वान्तेषु चतुष्कोटे: विकल्पस्य उक्त्ययोगत:] यदि यह कहा जाये कि सभी धर्मों में चतुष्कोटि विकल्प के कहने का अभाव है [तयो: संतानतद्वतो: तत्त्वान्यत्वं अवाच्यं] अत: उन संतान और संतान का भी तत्त्वएकत्वधर्म और अन्यत्वधर्म अवाच्य ठहरता है। बौद्ध के कथन का आचार्य आगे की कारिका द्वारा उत्तर दे रहे हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


सब धर्मों में चार कोटि से, भेद कहे नहिं जा सकते;;सत् या असत् उभय-अनुभय, इन चारों में ही दोष दिखे;;इसीलिए संतान और संतानी तत्त्व ‘अवाच्य’ कहे;;क्योंकि ये दोनों हि एक या, भिन्न नहीं यह बौद्ध कहें
सर्वांत-समस्त धर्मों में चार कोटि रूप विकल्प के कहने का अभाव होने से उन संतान और संतानी के तत्त्व-एकत्व और अन्यत्व-अनेकत्व धर्म अवाच्य हैं यदि बौद्ध ऐसा कहते है, तब तो आचार्य उसका स्पष्टीकरण करते हुए आगे कारिका में कहेंगे।