+ एकांत से अवक्तव्य मान्यता में दोष -
अवक्तव्यचतुष्कोटि-विकल्पोऽपि न कथ्यताम्
असर्वान्तमवस्तु स्या-दविशेष्य-विशेषणम् ॥46॥
अन्वयार्थ : [अवक्तव्यचतुष्कोटिविकल्प: अपि न कथ्यताम्] तब तो चार कोटि का विकल्प ‘अवक्तव्य’ है, यह भी नहीं कहना चाहिए [असर्वांतं अवस्तु अविशेष्यविशेषणं स्यात्] क्योंकि जो वस्तु सभी धर्मों से रहित है वह अवस्तु है और उसमें विशेषण-विशेष्य भाव भी नहीं बन सकता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


तब तो चतुष्कोटि का विकल्प, अवक्तव्य है इस विध भी;;नहीं कथन हो सकता फिर सब, वस्तु विकल्पातीत हुई;;सब धर्मों से विरहित वस्तू, सदा अवस्तूरूप हुई;;चूँकि विशेष्य-विशेषण भी, उसमें हो सकता कभी नहीं
''चतुष्कोटि विकल्प अवक्तव्य है'' ऐसा भी नहीं कहा जा सकेगा, पुन: वे जीवादि पदार्थ असर्वांत-सभी धर्मों से रहित होते हुए अवस्तुरूप ही हो जायेंगे।