+ सामान्य समवाय एक-एक हैं -
सामान्यं समवायश्चाप्येवैकैकत्र समाप्तित:।
अन्तरेणाश्रयं न स्यान्नाशोत्पादिषु को विधि: ॥65॥
अन्वयार्थ : [सामान्यं समवायश्च अपि आश्रयं अन्तरेण न स्यात् एकैकत्र समाप्तित:] ये सामान्य और समवाय दोनो भी आश्रय के बिना नहीं रह सकते हैं क्योंकि ये दोनों एक-एक ही हैं अत: एक-एक द्रव्य आदि में ही समाप्त हो जाते हैं [नाशोत्पादिषु क: विधि:] तब नाश हुए और उत्पन्न हुए अनित्य कार्यों में उन सामान्य और समवाय की व्यवस्था कैसे बनेगी ?

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


आश्रय बिन सामान्य और समवाय नहीं रहते प्रत्येक;;एक-एक द्रव्यादि नित्य में, समाप्त होते ये इक-एक;;पुन: नष्ट उत्पन्न अनित्यों कार्यों में कैसे होंगे?;;चूँकि नित्य ये दोनों उन, वस्तू में कैसे ठहरेंगे
जिस प्रकार से सामान्य सत्ता बिना आश्रय के नहीं रह सकता है, तथैव समवाय भी बिना आश्रय के नहीं रह सकता है और अपने आश्रयभूत प्रत्येक नित्य व्यक्तियों-पदार्थों में ये दोनों पूर्णरूप से रहते हैं। इसलिए नाशोत्पादादि-अनित्य पदार्थों में इनका विधान कैसे होगा अर्थात् इनका अस्तित्व वहाँ कैसे सिद्ध होगा ?