+ अब ऋजुसूत्र नय का निरूपण करते हैं -
ऋजुसूत्रस्य पर्याय: प्रधानं चित्रसंविद:॥
चेतनाणुसमूहत्वात्स्याद्भेदानुपलक्षणं॥13॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ऋजुसूत्रस्य प्रधानं पर्याय:] ऋजुसूत्र का विषय पर्याय है और [चित्रसंविद:] चित्रज्ञान में [चेतनाणुसमूहत्वात्] ज्ञान के अंशों का समूह होने से उसमें [भेदानुपलक्षणं स्यात्] भेद उपलक्षित नहीं होता है॥१३॥

  अभयचन्द्रसूरि 

अभयचन्द्रसूरि :

तात्पर्यवृत्ति-ऋजु अर्थात् प्रगुण-सरल वर्तमान पर्याय के लक्षण को जो सूचित करता है निरूपित करता है वह ऋजुसूत्रनय है अर्थात् ऋजुसूत्रनय का प्रधान-विषय वर्तमान पर्याय मात्र है क्योंकि अतीत पर्यायें विनष्ट हो चुकी हैं और भविष्यत् पर्यायें अभी-अभी उत्पन्न नहीं होने से असिद्ध हैं अत: ये अतीतानागत पर्यायें व्यवहार में उपयोगी नहीं हैं। ‘नय व्यवहार में अविसंवादी होते हैं’ ऐसा वचन है।

प्रश्न-एक चित्रज्ञान अनेकाकार है फिर भी व्यवहार में उपयोगी है।

उत्तर-नील, पीतादि नानारूप चित्र वाला संवेदन-ज्ञान चित्रज्ञान है, वह चेतना के अणुओं का समूह है अर्थात् चेतना-ज्ञान, उसके जो अणु-अंश-अविभागी प्रतिच्छेद हैं, उन ज्ञान के अविभागी प्रतिच्छेदों का समुदाय है इसलिए यह चित्रज्ञान वास्तव में ऋजुसूत्र नय का विषय नहीं है क्योंकि समुदाय प्रतिनियत व्यवहार में उपयोगी नहीं होता है।

प्रश्न-यदि ऐसी बात है तो उस चित्रज्ञान में भेद उपलक्षित क्यों नहीं होता है ?

उत्तर-उस चित्रज्ञान का भेद उपलक्षित नहीं होता है क्योंकि सदृश पर-अपर की उत्पत्ति होने से भ्रम हो जाता है अर्थात् भेदों में अनेक प्रकार उपलक्षित नहीं हैं-दिखते नहीं हैं, उसमें कारण यही है कि सदृश अपर-अपर की उत्पत्ति होने से उन भेदों को ग्रहण करने में बुद्धि वंचित हो जाती है, ऐसा अर्थ है। जिस प्रकार लोहे के गोले आदि मेें पर्याय का भेद विद्यमान होते हुए भी भ्रमबुद्धि से निश्चित नहीं होता है उसी प्रकार से चित्रज्ञान में भी उसके अंश भेद रहते हुए भी दिखते नहीं हैं।

अथवा कथंचित् द्रव्य के साथ अविनाभावी पर्याय ही ऋजुसूत्र नय का विषय है क्योंकि द्रव्य से निरपेक्ष पर्याय अवस्तुरूप है। निरन्वय वस्तु को मानने वाले क्षणिवैâकांत मत में यह नय ऋजुसूत्राभास है अर्थात् द्रव्यनिरपेक्ष पर्याय को विषय करने वाला नय ऋजुसूत्राभास कहलाता है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए।

विशेषार्थ-बौद्धों ने निरन्वय एक क्षणवर्ती पर्याय को स्वलक्षण कहा है और परमार्थसत् कहते हैं तथा उसे निर्विकल्प प्रत्यक्ष का विषय मानते हैं किन्तु वास्तव में विचार करके देखा जाये तो जैनों द्वारा मान्य ऋजुसूत्रनय एक क्षणवर्ती पर्याय को विषय करता है इसी नय के विषय को एकांत से ग्रहण करने से ये बौद्ध एकांतवादी बन गये हैं इसलिए यह ऋजुसूत्रनय इनके मत से नयाभास हो जाता है।