अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-‘जानाति ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञप्तिमात्रं वा ज्ञानं’ जो जानता है या जिसके द्वारा जाना जाता है अथवा जानना मात्र ही ‘ज्ञान’ कहलाता है। यहाँ द्रव्य और पर्याय में भेद-अभेद की विवक्षा के होने पर कर्ता आदि होते हैं अर्थात् द्रव्य और पर्याय में अभेद विवक्षा होने से ‘जो जानता है, वह ज्ञान है’ यह कर्तृत्व साधन होता है। द्रव्य पर्याय में भेद विवक्षा होने पर ‘जिसके द्वारा जाना जाय वह ज्ञान है’ ऐसा करण साधन होता है तथा भाव साधन में जानना मात्र ही ज्ञान है ऐसा कहा जाता है। आत्मादि अर्थात् आत्मा-स्वरूप है आदि में जिसके ऐसे बाह्य पदार्थ आत्मादि हैं इस कथन से स्व और अर्थ को ग्रहण किया है अर्थात् उपर्युक्त निरुक्ति से सिद्ध स्व और पर को ग्रहण करने वाला जो ज्ञान है। अथवा आत्मा-चैतन्य द्रव्य है, आदि शब्द से आवरणों का क्षयोपशम या क्षय अंतरंग है पुन: इंद्रियां और मन बहिरंग कहलाते हैं इन अंतरंग और बहिरंग हेतुओं से उत्पन्न होने वाला जो ज्ञान है वह ज्ञान प्रमाण माना गया है क्योंकि सकल विसंवादों का पहले ही निराकरण कर दिया है। उसी प्रकार से ज्ञाता-श्रुतज्ञानी के अभिप्राय को-विवक्षा को नय कहते हैं और उपाय- अधिगम-ज्ञान के हेतुभूत, नाम आदि रूप न्यास-निक्षेप कहलाता है। शंका-अर्थ स्वत: सिद्ध है पुन: इन प्रमाण आदिकों से क्या प्रयोजन है ? समाधान-नहीं! युक्ति से-प्रमाण, नय और निक्षेपों से ही जीवादि पदार्थों का परिग्रह-जानना होता है, स्वत: नहीं होता है। विशेषार्थ-यहाँ आचार्य ने यह स्पष्ट किया है कि प्रमाण, नय और निक्षेप के बिना जीवादि पदार्थों का समीचीन ज्ञान नहीं हो सकता है अत: पहले इन प्रमाण, नय, निक्षेपों के लक्षण को समझ लेना चाहिए, अनंतर इनके द्वारा जीवादि पदार्थों का निर्णय करना चाहिए। |