+ परम्परा हेतु का दूसरा दृष्टान्त -
नास्त्यत्र गुहायां मृगक्रीडनं, मृगारिसंशब्दनात् । कारणविरुद्धकार्यं विरुद्धकार्योपलब्धौ यथा ॥89॥
अन्वयार्थ : इस गुफा में हरिण की क्रीड़ा नहीं है, क्योंकि सिंह की गर्जना हो रही है, यह कारणविरुद्धकार्यरूप हेतु है, इसका विरुद्धकार्योपलब्धि हेतु में अन्तर्भाव होता है ।

  टीका 

टीका :

इस गुफा में हरिण की क्रीड़ा नहीं है, सिंह की गर्जना होने से, यहाँ पर कारण विरुद्ध कार्य विद्यमान है अर्थात् हरिणक्रीड़ा के कारण हरिण के विरोधी सिंह का शब्द रूप कार्य पाया जाता है । इसलिए इस हेतु का विरुद्धकार्योपलब्धि हेतु में अन्तर्भाव करना चाहिए और जैसे इस कारण विरुद्धकार्योपलब्धि का विरुद्धकार्योपलब्धि हेतु में अन्तर्भाव होता है, उसी प्रकार कार्य-कार्य हेतु का अविरुद्ध कार्योपलब्धि हेतु में अन्तर्भाव होता है ।