
टीका :
एकद्रव्य में क्रम से होने वाले भावों को पर्याय विशेष कहा जाता है। जैसे आत्मा में हर्ष विषाद आदिक भाव। यहाँ पर द्रव्य (आत्मद्रव्य) अपने शरीर के प्रमाण मात्र ही है, न व्यापक है और न वटकणिकामात्र है और न शरीराकार से परिणत भूतों के समुदाय रूप है। |