+ स्वरूपाभास -
अस्वसंविदित-गृहीतार्थदर्शनसंशयादयः प्रमाणाभासाः ॥2॥
अन्वयार्थ : अस्वसंविदित, गृहीतार्थ, दर्शन, संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय को प्रमाणाभास कहते हैं।

  टीका 

टीका :

अस्वसंविदित को, गृहीतार्थ ज्ञान को, दर्शन को, संशय को, विपर्यय को और अनध्यवसाय इस प्रकार सात प्रमाणाभास कहे गए हैं।

अस्वसंविदित, गृहीतार्थ, दर्शन और संशय है आदि में जिनके ऐसे संशयादि इन सभी का द्वन्द्व समास करना चाहिए। आदि शब्द से विपर्यय और अनध्यवसाय का भी ग्रहण करना है।

अस्वसंविदित ज्ञान - जो ज्ञान अपने आपके द्वारा अपने स्वरूप को नहीं जानता है, उसे अस्वसंविदित ज्ञान कहते हैं।

गृहीतार्थ ज्ञान - किसी यथार्थ ज्ञान के द्वारा पहले जाने हुए पदार्थ के पुनः जानने वाले ज्ञान को गृहीतार्थ ज्ञान कहते हैं।

निर्विकल्प ज्ञान - यह घट है, यह पट है, इत्यादि विकल्प से रहित निर्विकल्प रूप ज्ञान को दर्शन कहते हैं।