+ दृष्टान्त -
पुरुषान्तरपूर्वार्थगच्छत्तृणस्पर्शस्थाणुपुरुषादिज्ञानवत् ॥4॥
अन्वयार्थ : दूसरे पुरुष का ज्ञान गृहीतागृहीतज्ञान, चलते हुए पुरुष के तृण स्पर्शी ज्ञान के समान स्थाणु है या पुरुष ऐसे संशयादि ज्ञान प्रमाणाभास हैं।पुरुषान्तरं च पूर्वार्थं च, गच्छत्तृणस्पर्शं च, स्थाणुपुरुषादि च तेषां ज्ञानम् तद्वत् सूत्र में इस प्रकार द्वन्द्व समास कर लेना चाहिए।

  टीका 

टीका :

जैसे दूसरे पुरुष का ज्ञान, धारावाही ज्ञान, जाते मनुष्य के तृणस्पर्शी ज्ञान तथा स्थाणु में पुरुष का ज्ञान इत्यादि ज्ञानों के अपने-अपने विषय को निश्चय रूप से नहीं जानते इसलिए प्रमाणाभास हैं, उसी प्रकार अस्वसंविदित ज्ञानों के भी प्रमाणाभासपना सिद्ध होता है।

अस्वसंविदित ज्ञान प्रमाण नहीं होता, क्योंकि वह अपने विषय का निश्चायक नहीं है। जैसे - दूसरे पुरुष का ज्ञान । गृहीतार्थज्ञान प्रमाण नहीं होता क्योंकि वह अपने विषय का निश्चायक नहीं है। जैसे-पूर्व में जाने हुए पदार्थ का ज्ञान । निर्विकल्पज्ञान प्रमाण नहीं होता, क्योंकि वह अपने विषय का निश्चायक नहीं होता है। जैसे-चलते हुए पुरुष के तृण स्पर्शादि का ज्ञान। संशयादि ज्ञान भी प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि अपने विषय के निश्चायक नहीं हैं, जैसे-स्थाणु में पुरुष आदि का ज्ञान ।