+ सन्निकर्षवादी के प्रति दूसरा दृष्टान्त -
चक्षुरसयोर्द्रव्ये संयुक्तसमवायवच्च ॥5॥
अन्वयार्थ : द्रव्य में चक्षु और रस के संयुक्त समवाय के समान।

  टीका 

टीका :

जैसे घट-पटादि पदार्थों में, चक्षु और रस में संयुक्त समवाय नाम का सन्निकर्ष विद्यमान होने पर भी प्रमाण नहीं है, उसके अचेतन होने से प्रमिति क्रिया के प्रति करणपने का अभाव होने से और असन्निकृष्ट के ही चक्षुष के रूप उत्पन्न करते हुए देखा जाता है, अप्राप्यकारि होने से उस चक्षु इन्द्रिय के और इसको विशेष रूप से न्यायदीपिका ग्रन्थ से अथवा आगे लेखमाला में से जानना चाहिए।

इन्द्रिय और पदार्थ के संयोग को सन्निकर्ष कहते हैं। नैयायिक सन्निकर्ष के छ: भेद मानते हैं - संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसंवेत समवाय, समवाय, समवेतसमवाय और विशेषणविशेष्य भाव। आँख से घड़े को जानना संयोग सन्निकर्ष है। घड़े के रूप को जानना संयुक्त समवाय है, क्योंकि आँख के साथ घड़े का संयोग सम्बन्ध है और घड़े के साथ रूप का समवाय सम्बन्ध है। प्रकृत में इसी से प्रयोजन है। आचार्य भगवन् कहते हैं कि - जैसे घड़े और रूप का समवाय सम्बन्ध है, उसी प्रकार रस का भी समवाय सम्बन्ध है। इसलिए जैसे-आँख से घड़े को रूप का ज्ञान होता है, उसी प्रकार उसमें समवाय सम्बन्ध से रहने वाले रस का भी आँख से ज्ञान होना चाहिए, परन्तु होता नहीं है।