+ उपचरित सद्भूत व्‍यवहार-नय -
तत्र सोपाधिगुणगुणिनोर्भेदविषयः उपचरितसद्भूतव्‍यवहारो, यथा जीवस्‍य मतिज्ञानादयो गुणाः ॥224॥
अन्वयार्थ : उनमें से, कर्मजनित विकार सहित गुण और गुणी के भेद को विषय करने वाला उपचरित-सद्भूतव्‍यवहारनय है । जैसे -- जीव के मति-ज्ञानादिक गुण ।

  मुख्तार 

मुख्तार :

अशुद्ध-द्रव्‍य में गुण-गुणी का भेद कथन करने वाला उपचरित-असद्भूत व्‍यवहारनय है । अशुद्ध-द्रव्‍य में गुण-गुणी का, प्रदेशत्‍व की अपेक्षा, अभेद कथन करना अशुद्ध निश्‍चयनय का विषय है, किन्‍तु संज्ञा, संख्‍या, लक्षण, प्रयोजन आदि की अपेक्षा भेद कथन करना उपचरित सद्भूत व्‍यवहारनय का विषय है । दोनों ही कथन अपनी-अपनी अपेक्षा से वास्‍तविक हैं । इनमें से किसी का भी एकान्‍त ग्रहण करने से वस्‍तु-स्‍वरूप का अभाव हो जायगा, क्‍योंकि वस्‍तु भेदाभेदात्‍मक, अनेकान्‍तमयी है ।