
मुख्तार :
अशुद्ध-द्रव्य में गुण-गुणी का भेद कथन करने वाला उपचरित-असद्भूत व्यवहारनय है । अशुद्ध-द्रव्य में गुण-गुणी का, प्रदेशत्व की अपेक्षा, अभेद कथन करना अशुद्ध निश्चयनय का विषय है, किन्तु संज्ञा, संख्या, लक्षण, प्रयोजन आदि की अपेक्षा भेद कथन करना उपचरित सद्भूत व्यवहारनय का विषय है । दोनों ही कथन अपनी-अपनी अपेक्षा से वास्तविक हैं । इनमें से किसी का भी एकान्त ग्रहण करने से वस्तु-स्वरूप का अभाव हो जायगा, क्योंकि वस्तु भेदाभेदात्मक, अनेकान्तमयी है । |