+ अनुपचरितासद्भूत व्‍यवहार-नय -
संश्‍लेषसहितवस्‍तुसम्‍बन्‍धविषयोऽनुपचरितासद्भूतव्‍यवहारो, यथा जीवस्‍य शरीरमिति ॥228॥
अन्वयार्थ : संश्‍लेष सहित वस्‍तु के सम्‍बन्‍ध को विषय करने वाला अनुपचरितासद्भूतव्‍यवहार नय है, जैसे -- जीव का शरीर इत्‍यादि ।

  मुख्तार 

मुख्तार :

यद्यपि जीव का स्‍व-चतुष्‍टय भिन्‍न है और शरीर का स्‍व-चतुष्‍टय भिन्‍न है, तथापि जीव और शरीर का संश्‍लेष-सम्‍बन्‍ध है । जिस शरीर को धारण करे है, संकोच या विस्‍तार होकर आत्‍म-प्रदेश उस शरीर-प्रमाण व आकाररूप हो जाय हैं । कहा भी है --

अणुगुरूदेहपमाणो उवसंहारप्‍पसप्‍पदो चेदा । (वृ.द्र.सं.)

अर्थ – संकोच तथा विस्‍तार से यह जीव अपने छोटे और बड़े शरीर के प्रमाण रहता है ।

आत्‍मा और शरीरादिकरूप पुद्गल के एक क्षेत्रावगाहरूप बंधान है, तहाँ आत्‍मा हलन, चलन आदि किया करना चाहे और शरीर तिस शक्तिकर रहित है तो हलन, चलन किया न होय सके । इसी प्रकार शरीर में हलन, चलन शक्ति पाइये है और आत्‍मा की इच्‍छा हलन, चलन की न होय तो भी हलन, चलन न होय सके । यदि शरीर बलवान होय हालै चालै तो उसके साथ बिना इच्‍छा भी आत्‍मा हालै, चालै । जैसे कांपनी वायु की रूग्‍ण अवस्‍था में बिना इच्‍छा भी आत्‍मा हालै चालै है । और अधरंग रोग में इच्‍छा होते हुए भी हलन, चलन क्रिया नहीं होती है ।

शरीर, वचन, मन और प्राणापान-यह पुद्गलों का उपचार है । 'शरीर वाङ्मन: प्राणापानाः पुद्गलनाम् ॥त.सू.५/१९।' द्वारा ऐसा कहा भी गया है । शरीर, वचन और मन की क्रिया योग है और वही आस्रव है । कहा भी है --

कायवाङमनः कर्मयोगः ॥त.सू.६/१॥ स आस्रवः ॥६/२॥

इस प्रकार भिन्‍न, भिन्‍न चतुष्‍टय वाले जीव और शरीर का संश्‍लेष-संबंध है । यदि यह संश्‍लेष सम्‍बन्‍ध न माना जाय अथवा, जीव का शरीर न माना जाय तो शरीर के वघ से हिंसा के अभाव का प्रसंग आ जायगा । कहा भी है --

आत्‍मशरीरविभेदं वदन्ति ये सर्वथा ग‍तविवेकाः ।;;कायवधे इंत कथं तेषां संजायते हिंसा ॥अ.श्रा.६/२१॥

अर्थ – जो विवेक रहित आत्‍मा का और शरीर का सर्वथा भेद कहे हैं, तिन के मत में शरीर के वध होते संते हिंसा कैसे होय ? यह बड़े आश्‍चर्य की बात है।



श्री अमृतचन्‍द्राचार्य ने उपर्युक्‍त कथन को समयसार गाथा ४६ की टीका में निम्‍न शब्‍दों द्वारा कहा है --

तमंतरेण तु शरीराज्‍जीवस्‍य परमार्थतो भेददर्शनात्त्रसस्‍थावराणां भस्‍मन इव निःशंकमुपमदेनेन हिंसाऽभावादभवत्‍येव बंधस्‍याभावः । तथा रक्‍तो द्विष्‍टो विमूढो जीवो बघ्‍यमानो मोचनीय इति रागद्वेष मोहेभ्‍यो जीवस्‍य परमार्थतो भेददर्शनेन मोक्षोपायपरिग्रहणाभावात् भवत्‍येव मोक्षस्‍याभावः । (स.सा.४६.टी)

अर्थ – यदि इस असद्भूत व्‍यवहारनय को यथार्थ न माना जाय और परमार्थनय (शुद्धनिश्‍चय नय) को सर्वथा माना जाये तो निम्‍न दोष आयेंगे -- १. परमार्थनय जीव को शरीर से भिन्‍न कहता है, यदि उसका हो एकान्‍त किया जाय तो निःशंकपने से त्रस, स्‍थावर जीवों का घात करना सिद्ध हो सकता है। जैसे भस्‍म के मर्दन करने में हिंसा का अभाव है उसी तरह जीवों के शरीर को मारने में भी हिंसा सिद्ध नहीं होगी किन्‍तु हिंसा का अभाव ठहरेगा-तव उनके घात होने से बंध होने का भी अभाव ठहरेगा । २. उसी तरह रागी, द्वेषी, मोही जीव कर्म से बंधता है और उसको छुड़ाना है-ऐसा कहा गया है। परमार्थ (निश्‍चय नय) से राग, द्वेष, मोह से जीव को भिन्‍न बतलाने से मोक्ष के उपाय का (मोक्षमार्ग का) उपदेश व्‍यर्थ हो जायगा- तब मोक्ष का भी अभाव ठहरेगा । (समयसार गाथा ४६ टीका)

अतः व्‍यवहारनय से भी वस्‍तु-स्‍वरूप का कथन किया गया है ।

अतः असद्भूत व्‍यवहारनय का विषय 'जीव का शरीर' कहना यथार्थ है ।

॥ इस प्रकार पदार्थ के सरल-बोध के लिये श्रीमद्वेवसेनाचार्य विरचित आलापपद्धति समाप्‍त हुई ॥

तेतीस व्‍यंजनाए सत्तावीसं स्‍वरा तहा भणिया ।;;चत्तारिय योगवाहा चउसठ्टी मूल व्रण्‍णाउ ॥

अर्थ – ३३ व्‍यंजन अक्षर हैं, २७ स्‍वर हैं और ४ योगवाह हैं । इस प्रकार ६४ मूल वर्ण हैं ।

परिशिष्‍ट १

अनेकान्‍त व स्‍याद्वाद

भावः स्‍यादस्तिनास्‍तीति कुर्यान्निर्दोषमेंव तं ।;;फलेन चास्‍य संबन्‍धो नित्‍यानित्‍यादिकं तथा ॥

अर्थ – द्रव्‍य कथंचित् अस्ति है, कथंचित् नास्ति है, इस प्रकार की मान्‍यता निर्दोष है । फलितार्थ से उसी प्रकार कथंचित्-नित्‍य कथंचित्-अनित्‍य इस्‍यादिक से सम्‍बन्‍ध जोड़ना चाहिये ।

स्‍यादस्ति । स्‍यात् केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? स्‍वस्‍वरूपेणास्तित्‍वमिति । तर्हि स्‍याच्‍छव्‍देन किं । यथा स्‍वस्‍वरूपेणा-स्तित्‍वं तथा पररूपेणात्‍यस्तित्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यान्‍नास्‍तीति पररूपेणैव कुर्यात् स्‍यादस्तित्‍वाददोवतास्‍य फलं चास्‍यानेकस्‍वभावा-घारत्‍वं नास्तिस्‍वभावस्‍य तु संकरादिदोषरहितत्त्वं ।

स्‍यान्नित्‍य । स्‍यात्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायो ? द्रव्‍य-रूपेण नित्‍य इति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा द्रव्‍यरूपेण नित्‍यत्‍वं तथा पर्यायरूपेण नित्‍यत्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादनित्‍य इति पर्यायरूपेणैव कुर्यात् । स्‍यान्नित्‍यत्‍वाददोषता सफलं चास्‍य चिर-कालावस्‍थायित्‍वं । अनित्‍यस्‍वभावस्‍य तु कर्मादानविभोचनादिकं स्‍वहेतुभिः ।

स्‍यादेकः । स्‍यास्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसाषभिप्रायः ? सामान्‍य- रूपेणैकत्‍वमिति । तर्हि स्‍याच्‍छव्‍देन किं यथा सामान्‍यरूपेणैकत्‍वं तथा विशेषरूपेणाप्‍येकत्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादनेक इति विशेष-रूपेणैव कुर्यात् । स्‍यादेकत्‍वाददोषतास्‍य फलं चास्‍य सामान्‍यत्‍वसमर्थः । अनेकस्‍वभावस्‍य त्‍वनेकस्‍वभावदर्शकस्‍वं ।

स्‍याद् भेदः स्‍यात्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? सद्भूतव्‍यवहारेण भेद इति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा सद्भूत-व्‍यवहारेण भेद्स्‍तथा द्रव्‍यार्थिकेनापि माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादभेद इति द्रव्‍यार्थिकेनैव कुर्यात् । स्‍याद् भेदत्‍वाददोषतास्‍य फलं चास्‍य व्‍यवहारसिद्धिः । अभेदस्‍वभावस्‍य तु परमाथसिद्धिः ।

स्‍याद् भव्‍य: । स्‍यात्‍केनचिदाभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? स्‍वकीय स्‍वरूपेण भवनादिनि । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा स्‍वकीयरूपेण भवनं तथा पररूपेण भवनं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादभव्‍य इति पररूपेणैव कुयात् । स्‍याद् भव्‍यत्‍वाददोषतास्‍य फलं चास्‍य सवपर्यायः परिणामित्‍वं । अभव्‍यस्‍य तु परपर्यायत्‍यागित्‍वं ।

स्‍यात्‍परमः । स्‍यात्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? पारि-णामिकस्‍वभावत्‍वे‍नेति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा पारिणामिकः स्‍वभावं प्रघानत्‍वेन परस्‍वभावत्‍व तथा कर्मजस्‍वभावप्रघानत्‍वेन माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍याद् विभाव इति कर्मजरूपेणैव कुर्यात्‍ । स्‍यात्‍परमत्‍वाददोषतास्‍य फलं चास्‍य स्‍वभावादचलिता वृत्ति: । विभावस्‍य तु स्‍वभावे विकृतिः ।

स्‍याच्‍चेतन: । स्‍यात्‍केनचिदपि । कोसावभिप्रायः ? चेतनस्‍व-भावप्रधानत्‍वेनेति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा स्‍वभावप्रघानत्‍वेन चेतनत्‍वं तथाऽचेतनस्‍वभावेनापि चेतनत्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादचेतन इति व्‍यवहारेणैव कुर्यात् । स्‍याच्‍चेतनत्‍वाददोषतास्‍य फलं चास्‍य कर्मादानं हानिर्वा । अचेत नस्‍वभावस्‍य तु कर्मादानमेव ।

स्‍यान्‍मूर्तः । स्‍यात्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? असद्भूतव्‍यवहारेण मूर्त इति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथाऽसद्भूत-व्‍यवहारेण भूर्त्तत्‍वं तथा परमभावेन मूर्त्तत्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादमूर्त इति परमभावेनैव कुर्यात् । स्‍यान्‍मूर्त्तत्‍वाददोषतास्‍य फलं चास्‍य कर्मबन्‍धः । अमूर्त्तस्‍य तु स्‍वभावापरित्‍यागित्‍वं ।

स्‍यादेकप्रदेशः । स्‍यामत्‍केनचिदाभप्रायेण । कोसावभिप्रायो ? भेदकल्‍पना निरपेक्षेणेति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा भेदकल्‍पना निरपेक्षेणैकप्रदेशत्‍वं तथा व्‍यवहारणाप्‍येकप्रदेशत्‍वं माभूदिति स्‍याचछ-ब्‍दः । स्‍यादनेकप्रदेश इति व्‍यवहारेणैव कुर्यात् । स्‍यादेकप्रदेशत्‍वाद-दोषतास्‍य फलं चास्‍य निश्‍चयादेकत्‍वसमर्थनं । अनेक प्रदेशस्‍य तु अनेककार्यकारित्‍व ।

स्‍याच्‍छुद्धः । स्‍यात्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? केवलस्‍वभावप्रघानत्‍वेनेति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं ? यथा केवलस्‍व-भाव प्रघानत्‍वेन शुद्धस्‍वभावत्‍वं तथा मिश्रस्‍वभावप्रधानत्‍वेन शुद्धत्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादशुद्ध इति मिश्रभावेनैघ कुर्यात् । शुद्धत्‍वाददोषता तस्‍य फलं चास्‍य स्‍वभावावाप्तिः अशुद्धस्‍वभा-वस्‍य तु तद्विपरीता ।

स्‍यादुपचरितः । स्‍यात्‍केनचिदभिप्रायेण । कोसावभिप्रायः ? स्‍वभावस्‍याप्‍यन्‍यत्रोपचारादिति । तर्हि स्‍याच्‍छब्‍देन किं । यथा स्‍वभावस्‍याप्‍यन्‍यत्रोपचारादुपचरितसवभावत्‍वं तथानुपचारेणप्‍युपचा-रत्‍वं माभूदिति स्‍याच्‍छब्‍दः । स्‍यादनुपचरित इति निश्‍चयादेव कुर्यात् । स्‍यादुपचरिताद् दोषता तस्‍य फलं चास्‍य परज्ञतादयः । अनुपचरित-स्‍वभावस्‍य तथापि विपरीतं । (श्री आचार्य देवसेन कृतनयचक्र-सोलापुर से प्रकाशित)

अर्थ –
  • स्‍यात्, किसी अभिप्राय से, द्रव्‍य अस्तिरूप है, सद्भाव रूप है । वह अभिप्राय क्‍या है ? स्‍व-स्‍वरूप से वह है, यह अभिप्राय है । फिर स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार स्‍व-स्‍वरूप से है उसी प्रकार पर-स्‍वरूप से भी है, इस प्रकार की आपत्ति का निवारण करना स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है । कथंचित् पर-स्‍वरूप से नहीं है, इस प्रकार से प्रयोग करना चाहिए । कथंचित् अस्तित्‍व होने से दोष नहीं है । इसका फल अनेक स्‍वभाव-आधारत्‍वपना है। इतना विशेष है कि नास्ति-स्‍वभाव के संकरादि दोष रहितपना है ।

  • स्‍यात् अर्थात् किसी अभिप्राय से द्रव्‍य नित्‍य है । वह अभिप्राय क्‍या है ? द्रव्‍यरूप से नित्‍य है, यह अभिप्राय है । फिर स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार द्रव्‍य रूप से नित्‍य है उसी प्रकार पर्याय रूप से भी नित्‍य है, इस प्रकार की आपत्ति का निवारण करना स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है । कथंचित् पर्यायरूप से अनित्‍य है, इस प्रकार से प्रयोग करना चाहिए । स्‍यात् या कथंचित् का प्रयोग होने से नित्‍यता के निर्दोषता है । इसका फल चिरकाल तक स्‍थायीपना है । किन्‍तु, अनित्‍यस्‍वभाव से तो कर्म-ग्रहण व मोचन निज हेतुओं के द्वारा होते हैं ।

  • स्‍यात् द्रव्‍य के एकपना है । स्‍यात् अर्थात् किसी अभिप्राय से । वह अभिप्राय क्‍या है ? सामान्‍य रूप से द्रव्‍य के एकपना है, यह अभिप्राय है । फिर स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार सामान्‍यरूप से द्रव्‍य के एक-पना है, उसी प्रकार विशेषरूप से द्रव्‍य के अनेकपना है, इस प्रकार की आपत्ति का निवारण करना स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है । कथंचित् विशेषरूप से अनेकपना है, इस प्रकार से प्रयोग करना चाहिए । स्‍यात् या कथंचित् का प्रयोग होने से एकत्‍व के निर्दोषता है । इसका फल सामान्‍यपने में समर्थ है । अनेक-स्‍वभाव से तो अनेकपना है, ऐसा दिखाना है ।

  • कथंचित् भेद है । किसी अभिप्राय से अर्थात् सद्भूतव्‍यवहार से, भेद है । स्‍यात् शब्‍द से यहाँ क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार सद्भूतव्‍यवहार नय से भेद है, उसी प्रकार द्रव्‍यार्थिक नय (निश्‍चय नय) से भेद न हो, यह स्‍यात् पद का प्रयोजन है । कथंचित् अभेद है, यह प्रयोग द्रव्‍यार्थिक नय से करना चाहिए । कथंचित् का प्रयोग होने से भेदपना से निर्दोषता है और इसका फल व्‍यवहार की सिद्धि है, किन्‍तु अभेद स्‍वभाव से परमार्थ की सिद्धि होती है ।

  • कथंचित् भव्‍य है । किसी अभिप्राय से अर्थात् स्‍वकीय स्‍वरूप से परिणमन हो सकने से भव्‍यस्‍वरूप है । स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार स्‍वकीयस्‍वरूप से परिणमन हो सकता है वैसे परकीय रूप से परिणमन हो सके यह यहाँ पर स्‍यात् शबद से प्रयोजन है। कथंचित् अभव्‍य है, यह कथन 'पररूप से परिणमन नहीं होने से' ही करना चाहिए । कथंचित् अभव्‍यता मानने से इसमें दोष नहीं है और इसका फल स्‍वकीयरूप से परिणत होना है किन्‍तु अभव्‍यता का फल परपर्याय रूप से परिणमन का त्‍यागपना है।

  • कथंचित् परमस्‍वभावरूप है । किसी अभिप्राय से अर्थात् परिणामिक भाव से परम-स्‍वभावरूप है । स्‍यात् शब्‍द से यहाँ क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार पारिणामिक भाव से परमस्‍वरूप है उसी प्रकार कर्म-जनित भाव से परम-स्‍वभाव न हो । कथंचित् विभावरूप है, यह कर्मजभाव से होता है। कथंचित् परम-स्‍वभाव होने से दोष नहीं है, इसका फल स्‍वभाव से अचलित रूप वृत्ति है । किन्‍तु विभाव का फल स्‍वभाव में विकृ‍ति है ।

  • कथंचित् चेतन है । किसी अभिप्राय से अर्थात् चेतन-स्‍वभाव की प्रधानता से चेतन है। यहाँ स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है? जिस प्रकार चेतन-स्‍वभाव की प्रधानता से चेतनत्‍व है, वैसे अचेतनत्‍व की अपेक्षा न हो, यह स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है। कथंचित् अचेतन है, यह व्‍यवहार से कहना चाहिये । कथंचित् चेतनपना होने से इसके दोष नहीं है, इसका फल कर्म की हानि है । किन्‍तु अचेतनस्‍वभाव के मानने का फल कर्म का ग्रहण ही है।

  • कथंचित् मूर्त है । किसी अभिप्राय से अर्थात् असद्भूत व्‍यवहारनय से मूर्त है । यहाँ स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जिस प्रकार असद्भूत-व्‍यवहार नय से मूर्त है, वैसे परमभाव से मूर्त न हो, यह स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है । कथंचित् अमूर्त है, ऐसा परमभाव से कहना चाहिये । कथंचित् मूर्त होने से इसके दोष नहीं है, इसका फल कर्मबंध है। किन्‍तु अमूर्त मानने का फल स्‍वभाव का अपरित्‍याग है ।

  • कथंचित् एकप्रदेशी है । किसी अभिप्राय से अर्थात् भेदकल्‍पना-निरपेक्ष अभिप्राय से एकप्रदेशी है । यहाँ स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जैसे भेद-कल्‍पना-निरपेक्षता से एक प्रदेशपना है उसी प्रकार व्‍यवहार से एक प्रदेशपना न हो, यह स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है । कथंचित् अनेक-प्रदेशी है, ऐसा व्‍यवहारनय से ही मानना चाहिये । कथंचित् एक-प्रदेशपना होने से दोष नहीं है । और इसका फल निश्‍चय से एकपने का समर्थन है । किन्‍तु अनेक-प्रदेशत्‍व का फल अनेक-कार्यकारित्‍व है।

  • कथंचित् शुद्ध है । किसी अभिप्राय से अर्थात् केवल-स्‍वभाव की प्रधानता से शुद्ध-स्‍वभाव है । स्‍यात् शब्‍द से यहाँ क्‍या प्रयोजन है ? जैसे केलव-स्‍वभावपने से शुद्धता है वैसे मिश्र-स्‍वभावपने से शुद्धता न हो इसलिये स्‍यात् शब्‍द है । कथंचित् अशुद्ध है, ऐसा प्रयोग मिश्र-स्‍वभाव से ही करना चाहिये । कथंचित् शुद्धपना होने से इसके निर्दोषता है और इसका फल स्‍वभाव की प्राप्ति है, किन्‍तु अशुद्ध स्‍वभाव का फल स्‍वभाव की प्राप्ति नहीं है ।

  • कथंचित् उपचरित है । किसी अभिप्राय से अर्थात् स्‍वभाव के भी अन्‍यत्र उपचार से उपचरित-स्‍वभाव है । यहाँ पर स्‍यात् शब्‍द से क्‍या प्रयोजन है ? जैसे उपचरित नय से अन्‍यत्र-स्‍वभाव का उपचार होने से उपचरितपना है, वैसे अनुपचरित-स्‍वभाव से उपचारपना न हो, यह स्‍यात् शब्‍द का प्रयोजन है । कथंचित् अनूपचरित है, यह निश्‍चय से समझना चाहिये । कथंचित् उपचरितपन होने से दोष नहीं है. और उसका फल परज्ञता और सर्वज्ञता है । अनुपचरित का फल उससे विपरीत आत्‍मज्ञता है ।


स्‍याद्वादो् हि समस्‍तवस्‍तुतत्त्वसाधकमेवमेकस्‍खलितं शासनमर्हत्‍सर्वज्ञस्‍य । स तु सर्वमनेकांतात्‍मकमित्‍यनुशास्ति, सर्वस्‍यापि वस्‍तुनोऽनेकांतस्‍त्रभावत्‍वात् । यदेव तत् तदे्वातत् यदेवैकं तदेवानेकं, यदेव सत्तदेवासत्, यदेव नित्‍यं तदेवानित्‍यमित्‍येकवस्‍तुवस्‍तुत्‍व-निष्‍पादकंपरस्‍परविरूद्ध शक्तिद्धय-प्रकाशनमनेकांतः । (स.सा. आत्‍मख्‍याति, स्‍याद्वादाधिकार)

अर्थ – स्‍याद्वाद है वह सब वस्‍तु-स्‍वरूप के साधने वाला एक निर्बाध अर्हत्‍सवंश का शासन है । वह स्‍याद्वाद सव वस्‍तुओं को 'अनेकांतात्‍मक' ऐसा कहता है, क्‍योंकि सभी पदार्थों का अनेक धर्मरूप स्‍वभाव है । अनेकान्‍त का ऐसा स्‍वरूप है कि जो वस्‍तु तत् रूप है वही अतत् स्‍वरूप है, जो सत्‍स्‍वरूप है वही वस्‍तु असत्‍स्‍वरूप है, जो वस्‍तु नित्‍यरूप है वही वस्‍तु अनित्‍यरूप है । इस तरह एक वस्‍तु में वस्‍तुपने की उपजाने वाली परस्‍पर विरूद्ध दो शक्तियों का प्रकाश होता है ।

इससे उस मत का खण्‍डन हो जाता है जो अनेकान्‍त व स्‍याद्वाद का स्‍वरूप ऐसा मानते हैं कि वस्‍तु नित्‍य है, अनित्‍य नहीं है; एक है, अनेक नहीं है, अभेद है, भेद नहीं है इत्‍यादि, कयोंकि इससे तो सर्वथा एक धर्म की सिद्धि होती है ।

परसमयाणं वयणं मिच्‍छं खलु होदि सव्‍वद्दा वयणा ।;;जइणाणं पुण वयणं सम्‍म खु कहंचि वयणादो ॥

अर्थ – परसमयों (अजैनों) का वचन 'सर्वथा' कहा जाने से वास्‍तव में मिथ्‍या है और जैनो का वचन 'कथंचित्' कहा जाने से वास्‍तव में सम्‍यक् है ।

परिशिष्‍ट-२

अर्थक्रियाकारित्‍व

अनुवृत्तव्‍यावृत्तप्रत्‍ययगोचरत्‍वात्‍पूर्वोत्तराकारपरिहारा वाप्तिस्थितिलक्षणपरिणामेना‍र्थक्रियोपपत्तेश्‍य ।

वस्‍तु अनुवृत्त (सामान्‍य अथवा गुण) और व्‍यावृत्त (पर्याय) रूप से दिखाई देती है तथा पूर्व पर्याय का परिहार (नाश) और स्थिति (ध्रौव्‍य) रूप परिणमन से अर्थक्रिया की उत्‍पत्ति होती है ।

अर्थक्रियाविरोधादिति=कार्यकर्तृत्‍वायोगात्

सामान्‍य-विशेषात्‍मक वस्‍तु में उत्‍पाद, व्‍यय, ध्रौव्‍य रूप अर्थ-क्रिया होती है ।

त्रिलक्षणाभावतः अवस्‍तुनि परिच्‍छेदलक्षणार्थ क्रियाभावात् ।

उत्‍पाद, व्‍यय और ध्रौव्‍य रूप लक्षणत्रय का अभाव होने के कारण अवस्‍तु स्‍वरूप जो ज्ञान उसमें परिच्छिति रूप अर्थ-क्रिया का अभाव है । जैसे-जैसे ज्ञेयों में उत्‍पाद, व्‍यय, ध्रौव्‍य रूप परिणमन होता है उस ही के अनुसार ज्ञान में भी जानने की अपेक्षा उत्‍पाद, व्‍यय, ध्रौव्‍य होता रहता है । जो पर्याय प्रति-क्षण उत्‍पन्‍न होती है उस पर्याय को ज्ञान सद्भाव रूप से जानता है । जो उत्‍पन्‍न होकर विनष्‍ट हो चुकी हैं या अनुत्‍पन्‍न हैं उनको अभाव रूप से जानता है, अन्‍यथा ज्ञेयों के अनुकूल ज्ञान में परिणमन नहीं बन सकता ।

स्‍वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा में भी कहा है-

जं वत्‍थु अणेयंतं तं चिय कज्‍जं करेदि णियमेण ।;;बहुधम्‍मजुदं अत्‍थं कज्‍जकरं दीसदे लोए ॥का.अ.२२५॥;;एयंतं पुणु दव्‍वं कज्‍जं ण करेदि लेसमेत्त पि ।;;जे पुणु ण करदि कज्‍जं तं वुच्‍चदि केरिसं दव्‍वं ॥२२६॥

टीका-कार्य न करोति, तुच्‍छमपि प्रयोजनं न विद् घाति ।

अर्थ – जो वस्‍तु अनेकान्‍त रूप है वही नियम से कार्यकारी है, क्‍योंकि लोक में बहुत धर्मयुक्‍त पदार्थ ही कार्यकारी देखा जाता है । एकान्‍त रूप द्रव्‍य लेशमात्र भी कार्य नहीं करना । और जो कार्य नहीं करता उसको द्रव्‍य कैसे कहा जाय ?

कार्य नहीं करता अघात् किचित् भी प्रयोजनवान् नहीं है ।

अर्थस्‍य कार्यस्‍य क्रिया करणं निष्‍पत्तिर्न युज्‍येत् । (लघीयस्‍त्रय/२२)

प्रयोजन निष्‍पत्ति को अर्थ-क्रिया कहते हैं । जैसे, ज्ञान का प्रयोजन जानना है, अतः ज्ञान का परिच्छित्त्‍िा रूप जो परिणमन है वही ज्ञान की अर्थक्रिया है । अपने स्‍वरूप को न छोड़कर परिणमन करना द्रव्‍य का प्रयोजन है, क्‍योंकि उत्‍पाद, व्‍यय, ध्रौव्‍य से ही द्रव्‍य की सत्ता है। अतः द्रव्‍य में जो परिणमन रूप क्रिया होती है वह द्रव्‍य की अर्थ – क्रिया है।

श्री पं० पन्‍नालाल जी साहित्‍याचार्य, सागर लिखते है -- अर्थक्रियाकारित्‍व का अर्थ है -- जिस पदार्थ को जिस रूप से जाना है, उस रूप से उसका कार्य ही होना । जैसे जल का जल रूप जाना, यहाँ जल में स्‍नान, अवगाहन आदि क्रिया होती है वह जल का अर्थ-क्रिया-कारित्‍व है । अर्थ-क्रिया-कारित्‍व से अपने द्वारा ज्ञात पदार्थ का यथार्थ निर्णय हो जाता है और जहां अर्थ-क्रिया-कारित्‍व नहीं होता, वही वस्‍तु की यथार्थता का निर्णय नहीं होता ।

श्री पं० जीवंधर जी, इन्‍दौर लिखते हैं -- प्रत्‍येक सद्भूत पदार्थ जो भी कार्य करता है या परिणति करता है वही उसकी अर्थक्रिया है ।

अनेक-क्रिया-कारित्‍व

अनेका-क्रिया-कारित्‍व :- एक पदार्थ सहकारी कारणों के वैविध्य से अनेक कार्यो का संपादन करता है, अतः वह अनेक-क्रिया-कारित्‍व कहा जाता है । जैसे -- एक ही दीपक एक ही समय में अन्‍धकार का नाश करता है, प्रकाश फैलाता है, बत्ती का मुख जलाता है, तेल का शोषण करता है, घूम्र रूपी लालिमा को उत्‍पन्‍न करता है । इन अनेक कार्यो का निर्यापक होने से वह अनेक-क्रिया-कारित्‍व माना जाता है । (श्री पं० जीवंधर जी, इन्‍दौर)

परिशिष्‍ट-४

संकर आदि आठ दोष

सूत्र १२७ य उसके टिप्‍पण में संकर आदि आठ दोषों का वर्णन है । उन आठ दोषों का विशेष कथन 'प्रमेयरत्‍नमाला' के अनुसार निम्‍न प्रकार है --

भेदाभेद् योर्विघिनिषेघयोरेकत्राभिन्‍ने वस्‍तुन्‍यसम्‍भवः शीतोष्‍ण-स्‍पर्शयोर्वेति १। भेद्स्‍यान्‍यदधिकरणमभेदस्‍य चान्‍यदिति वैयघि-करण्‍यम् २। यमात्‍मानं पुरोघाय भेदो यं च समा‍धित्‍याभेदः, तावा-त्‍मनौ भिन्‍नौ चाभिन्‍नौ च । तत्रापि तथापरिकल्‍पनादनवस्‍या ३।येन रूपेण भेदस्‍तेन भेदश्‍चाभेदश्‍चेति सक्‍ङर: ४। येन भेदस्‍तेनाभेदो येनाभेदस्‍तेन भेद इति व्‍यतिकरः ५। भेदाभेदात्‍मकत्‍वे च वस्‍तुनो-ऽसाधारणाकारेण निश्‍चेतुमशक्‍तेः संशयः ६। ततश्‍चाप्रतिपत्तिः ७। ततोऽभावः ८।

अर्थ –
  • भेद अैर अभेद ये दोनों विधि और निषेध स्‍वरूप हैं, इसलिये उनका एक अभिन्‍न वस्‍तु में रहना असम्‍भव है, जैसे कि शीत और उष्‍ण स्‍पर्श का एक साथ वस्‍तु में रहना असम्‍भव है । इस प्रकार जीवादि पदार्थों को सामान्‍य-विशेषात्‍मक मानने पर विरोध दोष आता है ॥१॥
  • भेद का आधार अन्‍य है और अभेद का आधार अन्‍य है, इसलिये इन दोनों का एक आधार मानने से वैयधिकरण्‍य दोष भी आता है ॥२॥
  • जिस स्‍वरूप को मुख्‍य करके भेद कहा जाता है और जिस स्‍वरूप का आश्रय लेकर, अभेद कहा जाता है, वे दोनों स्‍वरूप भिन्‍न भी हैं और अभिन्‍न भी हैं । पुनः उनमें भी भेद, अभेद की कल्‍पना से अनवस्‍था दोष प्राप्‍त होता हैं ॥३॥
  • जिस रूप से भेद है, उस रूप से भेद भी है, अभेद भी है; अतः संकर दोष प्राप्‍त होता है ॥४॥
  • जिस अपेक्षा से भेद है, उसी अपेक्षा से अभेद है और जिस अपेक्षा से अभेद है उसी अपेक्षा से भेद है, इस प्रकार व्‍यतिकर दोष आता है ॥५॥
  • वस्‍तु को भेदाभेदात्‍मक मानने पर उसका असाधारण आकार से निश्‍चय नहीं किया जा सकता, अतः संशय दोष आता है ॥६॥
  • संशय होने से उसका ठीक ज्ञान नहीं हो पाता, अतः अप्रतिपत्ति नामक दोष आता है ॥७॥
  • ठीक प्रतिपत्ति के न होने से अभाव नाम का दोष भी आता है ॥८॥
निरपेक्ष, एकान्‍त दृष्टि में ये आठों दोष सम्‍भव हैं । सापेक्ष, अनेकान्‍त दृष्टि में इन आठ दोषों में से एक दोष भी सम्‍भव नहीं है ।

जो गुण और गुणी (द्रव्‍य) में सर्वथा भेद मानते हैं, उनके मत में उपर्युक्‍त आठों दोष संभव हैं, जो गुण और गुणी का सर्वथा अभेद मानते हैं, उनके मत में उपर्युक्‍त आठों दोष सम्‍भव है तथा जो भेद और अभेद को परस्‍पर सापेक्ष नहीं मानते हैं उनके मत में भी उपर्युक्‍त आठों दोष सम्‍भव हैं । किन्‍तु, भेद और अभेद को सापेक्ष मानने वाले स्‍याद्वादियों के मत में उक्‍त आठ दोष सम्‍भव नहीं हैं क्‍योंकि, वस्‍तु-स्‍वरूप अनेकान्‍तात्‍मक है ।