
मुख्तार :
देवदत्त और धन भिन्न-सत्ता वाले द्रव्य हैं । इन दोनों का संश्लेष सम्बन्ध भी नहीं है । किन्तु, स्व-स्वामी सम्बन्ध है । देवदत्त धन का स्वामी है और धन उसका स्व है । देवदत्त को अधिकार है कि वह अपने धन को तीर्थ-वन्दना, जिन-मन्दिर-निर्माण तथा दान आदिक धर्म-कार्यों में व्यय करे या अपने भोगोपभोग में व्यय करे । देवदत्त के धन को व्यय करने का देवदत्त के अतिरिक्त अन्य किसी पुरूष को अधिकार नहीं है । देवदत्त के दिये बिना यदि देवदत्त के धन को कोई अन्य पुरूष ग्रहण करता है तो वह चोर है, क्योंकि 'अद्त्तादानं स्तेयम्' ऐसा आर्ष-वाक्य है । इसी प्रकार ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्ध भी इस उपचरितासद्भूत व्यवहारनय का विषय है, क्योंकि ज्ञान का स्व-चतुष्टय भिन्न है और ज्ञेय-द्रव्यों का स्वचतुष्टय भिन्न है । ज्ञान और ज्ञेय में संश्लेष सम्बन्ध भी नहीं है तथापि ज्ञान ज्ञेयों को जानता है और ज्ञेय ज्ञान के द्वारा जाने जाते हैं । अतः ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्ध यथार्थ है जो कि उपचरितासद्भूत व्यवहारनय का विषय है । यदि ज्ञान-ज्ञेय सम्बन्ध यथार्थ न हो तो सर्वज्ञता का अभाव हो जायगा । इसी प्रकार अन्य सम्बन्धों के विषय में भी जानना चाहिये । |