+ बन्ध्-मोक्ष की समीचीन सिद्धि अनेकान्त मत से ही संभव -
प्रमुच्यते च प्रतिपक्षदूषी
जिन: त्वदीयै: पटुसिंहनादै: ।
एकस्य नानात्मतया ज्ञवृत्ते-
स्तौ बंधमोक्षौ स्वमतादबाह्यौ ॥52॥
अन्वयार्थ : जो [प्रतिपक्षदूषी च] प्रतिद्वन्द्वी का सर्वथा निराकरण करने वाला (एकान्तग्रही) है वह तो [जिन!] हे वीर जिन! [त्वदीयैः] आप (अनेकान्तवादी) के [एकस्य नानात्मतया] एकाऽनेकरूपता जैसे [पटुसिंहनादैः] निश्चयात्मक एवं सिंहगर्जना की तरह अबाध्य (ऐसे युक्ति-शास्त्रऽविरोधी आगमवाक्यों के प्रयोग) द्वारा [प्रमुच्यते] मुक्त कराता है। अतः [बन्धमोक्षौ] बन्ध और मोक्ष [स्वमतात्] अपने (अनेकान्त) मत से [अबाह्यौ] बाह्य नहीं हैं, क्योंकि [तौ] वे दोनों (बन्ध और मोक्ष) [ज्ञवृत्तेः] (अनेकान्तवादियों के द्वारा स्वीकृत) ज्ञाता (आत्मा) में ही उनकी प्रवृत्ति है ।

  वर्णी 

वर्णी :

प्रमुच्यते च प्रतिपक्षदूषी

जिन: त्वदीयै: पटुसिंहनादै: ।

एकस्य नानात्मतया ज्ञवृत्ते-

स्तौ बंधमोक्षौ स्वमतादबाह्यौ ॥52॥