
प्रमुच्यते च प्रतिपक्षदूषी
जिन: त्वदीयै: पटुसिंहनादै: ।
एकस्य नानात्मतया ज्ञवृत्ते-
स्तौ बंधमोक्षौ स्वमतादबाह्यौ ॥52॥
अन्वयार्थ : जो [प्रतिपक्षदूषी च] प्रतिद्वन्द्वी का सर्वथा निराकरण करने वाला है वह तो [जिन!] हे वीर जिन! [त्वदीयैः] आप के [एकस्य नानात्मतया] एकाऽनेकरूपता जैसे [पटुसिंहनादैः] निश्चयात्मक एवं सिंहगर्जना की तरह अबाध्य द्वारा [प्रमुच्यते] मुक्त कराता है। अतः [बन्धमोक्षौ] बन्ध और मोक्ष [स्वमतात्] अपने मत से [अबाह्यौ] बाह्य नहीं हैं, क्योंकि [तौ] वे दोनों [ज्ञवृत्तेः] ज्ञाता में ही उनकी प्रवृत्ति है ।
वर्णी
वर्णी :
प्रमुच्यते च प्रतिपक्षदूषी
जिन: त्वदीयै: पटुसिंहनादै: ।
एकस्य नानात्मतया ज्ञवृत्ते-
स्तौ बंधमोक्षौ स्वमतादबाह्यौ ॥52॥
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