
एकांतधर्माऽभिनिवेश मूला-
रागादयोऽहंकृतिजा जनानाम् ।
एकांत हानाच्च स यत्तदेव
स्वाभाविकत्वाच्च समं मनस्ते ॥51॥
अन्वयार्थ : वे [रागादयः] राग-द्वेषादिक [एकान्त-र्ध्माऽभिनिवेशमूलाः] एकान्त-रूप से निश्चय किये हुए धर्म में आसक्ति का मूल कारण होता है [जनानां] जीवों की [अहंकृतिजाः] अहंकार तथा ममकार से उत्पन्न होते हैं [च] और [एकान्तहानात्] एकान्त ग्रहण न होने से [स] वह [यत् स्वाभाविकत्वात्] उसी अनेकान्त के निश्चयरूप सम्यग्दर्शनत्व को धारण करता है जो आत्मा का स्वाभाविक रूप है । अतः [ते] आपके यहाँ [तदेव] ऐसे ही [समं मनः] मन का समत्व ठीक घटित होता है ।
वर्णी
वर्णी :
एकांतधर्माऽभिनिवेश मूला-
रागादयोऽहंकृतिजा जनानाम् ।
एकांत हानाच्च स यत्तदेव
स्वाभाविकत्वाच्च समं मनस्ते ॥51॥
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