
अमेयमश्लिष्टममेयमेव
भेदेऽपि तद᳭वृत्त्यपवृत्तिभावात् ।
वृत्तिश्च कृत्स्नांश विकल्पतो न
मानं च नाऽनन्तसमाश्रयस्य ॥54॥
अन्वयार्थ : [भेदेऽपि] भेद के मानने पर भी [अमेयम्] जो अमेय है और [अश्लिष्टम्] किसी भी प्रकार के विशेष को साथ में लिये नहीं है वह सामान्य [अमेयम्] अप्रमेय [एव] ही है, क्योंकि [तद्वृत्त्यपवृत्तिभावात्] उन द्रव्यादिकों में उसकी वृत्ति की अपवृत्ति का सद्भाव है। [वृत्तिः च] वह वृत्ति भी [कृत्स्नांशविकल्पतः न] निरंश विकल्परूप से मानकर बनती है और न अंश विकल्परूप से मानकर बनती है। [अनन्तसमाश्रयस्य च] जो अनन्त व्यक्तियों के समाश्रयरूप है उस एक के ग्राहक [मानं] प्रमाण [न] का अभाव है ।
वर्णी
वर्णी :
अमेयमश्लिष्टममेयमेव
भेदेऽपि तद᳭वृत्त्यपवृत्तिभावात् ।
वृत्तिश्च कृत्स्नांश विकल्पतो न
मानं च नाऽनन्तसमाश्रयस्य ॥54॥
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