
नाना सदेकास्मसमाश्रयं चेद्-
ऽन्यत्वमद्विष्ठमनात्मनोः क्व ।
विकल्पशून्यत्वमवस्तुनश्चेत्
तस्मिन्नमेये क्व खलु प्रमाणम् ॥55॥
अन्वयार्थ : [नाना-सदेकात्मसमाश्रयं] नाना सत्वों का एक आत्मा ही जिसका समाश्रय है [चेत्] ऐसा सामान्य यदि माना जाये और उसे ही प्रमाण का विषय बतलाया जाये तो यह प्रश्न होता है कि उनका वह सामान्य [अन्यत्वम्] अन्य है [अद्विष्ठम्] या अनन्य ? [अनात्मनोः] व्यक्तियों तथा सामान्य दोनों के ही अनात्मा होने पर वह अन्यत्वगुण [क्व] किसमें रहेगा? [चेत्] यदि सामान्य को [अवस्तुनः] अवस्तु ही इष्ट किया जाये और उसे [विकल्पशून्यत्वम्] विकल्पों से शून्य माना जाये [तस्मिन् अमेये] तो उस अवस्तुरूप सामान्य के अमेय होने पर [प्रमाणम्] प्रमाण की प्रवृत्ति [क्व खलु] कहाँ होती है?
वर्णी
वर्णी :
नाना सदेकास्मसमाश्रयं चेद्-
ऽन्यत्वमद्विष्ठमनात्मनोः क्व ।
विकल्पशून्यत्वमवस्तुनश्चेत्
तस्मिन्नमेये क्व खलु प्रमाणम् ॥55॥
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