इति स्तुत्य: स्तुत्यैस्त्रिदशमुनिमुख्यै: प्रणिहितैः,
स्तुत: शक्त्या श्रेय: पदमधिगतस्त्वं जिन ! मया ।
महावीरो वीरो दुरितपरसेनाऽभिविजये
विधेया मे भक्तिं पथि भवत एवाप्रतिनिधौ ॥64॥
अन्वयार्थ : [जिन!] हे वीर जिन! [त्वं] आप [दुरित-पर-सेनाभिविजये] दुष्कृत पर की सेना को पूर्णरूप से पराजित करने से [वीरः] वीर हैं, [श्रेयः पदं] मोक्ष-पद को [अधिगतः] प्राप्त करने से [महावीरः] महावीर हैं और [त्रिदश-मुनिमुख्यैः] देवेन्द्रों और मुनीन्द्रों जैसे [स्तुत्यैः] स्वयं स्तुत्यों के द्वारा [प्रणिहितैः] एकाग्रमन से [स्तुत्यः] स्तुत्य हैं । [इति] इसी से [मया] मेरे द्वारा [शक्त्या] शक्ति के अनुरूप [स्तुतः] स्तुति किये गये हैं । अतः [पथि एव] अपने ही मार्ग में, [भवतः अप्रतिनिधौ] जो प्रतिनिधि रहित है, [मे] मेरी [भक्ति] भक्ति को [विधेया] सविशेषरूप से चरितार्थ करो ।
वर्णी
वर्णी :
इति स्तुत्य: स्तुत्यैस्त्रिदशमुनिमुख्यै: प्रणिहितैः,
स्तुत: शक्त्या श्रेय: पदमधिगतस्त्वं जिन ! मया ।
महावीरो वीरो दुरितपरसेनाऽभिविजये
विधेया मे भक्तिं पथि भवत एवाप्रतिनिधौ ॥64॥
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