
न रागान्न: स्तोत्रं भवति भवपाशच्छिदि मुनौ,
न चान्येषु द्वेषादपगुणकथाभ्यासखलता ।
किमु न्यायान्यायप्रकृतगुणदोषज्ञ मनसां
हितान्वेषोपायस्तव गुणकथासङ्गगदित: ॥63॥
अन्वयार्थ : [स्तोत्रां] हमारा यह स्तोत्रा [भवपाशच्छिदि] आप जैसे भव-पाश-छेदक [मुनौ] मुनि के प्रति [रागात् न भवति] रागभाव से नहीं है, [न] न हो सकता है । [च] और [अन्येषु] दूसरों के प्रति [द्वेषात्] द्वेषभाव से भी इस स्तोत्र का कोई [न] सम्बन्ध नहीं है हम तो [अपगुण-कथाभ्यास-खलता] दुर्गुणों की कथा के अभ्यास को दुष्टता समझते हैं । उद्देश्य यही है कि [न्यायान्याय-प्रकृत-गुण-दोष-ज्ञमनसां किमु] जो लोग न्याय-अन्याय को पहचानना चाहते हैं, और प्रकृत पदार्थ के गुण-दोषों को जानने की जिनकी इच्छा है, उनके लिये यह स्तोत्रा [हितान्वेषोपायः] 'हितान्वेषण के उपायस्वरूप' [तव] आपकी [गुण-कथा-सङ्ग-गदितः] गुण-कथा के साथ कहा गया है ।
वर्णी
वर्णी :
न रागान्न: स्तोत्रं भवति भवपाशच्छिदि मुनौ,
न चान्येषु द्वेषादपगुणकथाभ्यासखलता ।
किमु न्यायान्यायप्रकृतगुणदोषज्ञ मनसां
हितान्वेषोपायस्तव गुणकथासङ्गगदित: ॥63॥
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