+ अल्पज्ञ का पदार्थ-ज्ञान दर्शनपूर्वक -
मइसुयणाणणिमित्तो छउमत्थे होइ अत्थउवलंभो ।
एगयरम्मि वि तेसिं ण दंसणं दसणं कत्तो ? ॥27॥
अन्वयार्थ : [छउमत्थे] छद्मस्थ (अल्प ज्ञान वाले जीवों) में [मइसुयणाण] मतिज्ञान (और) श्रुतज्ञान (के) [णिमित्तो] निमित्त (से) [अत्यउवलंभो] पदार्थ (का) ज्ञान [होइ] होता है [तेसिं] उन दोनों (ज्ञानों में से) में [एगयरम्मि] एक में (यदि) [ण] नहीं [दंसणं] दर्शन (ज्ञान के पहले वस्तु को देखना है) (तो फिर) [दंसणं] दर्शन [कत्तो] कहाँ से हो सकता है ?
Meaning : In the case of Chadmasthas, Mati and Sruta-Gyana are the two things responsible for arriving at a cognition of categories. If there is nothing like Mati-darsana or Sruta-darsana, how then Darsana is at all possible ?

  विशेष 

विशेष :

अल्पज्ञों को पदार्थ का ज्ञान मतिज्ञान और श्रुतज्ञान के निमित्त से होता है । मतिज्ञान से होने वाला वस्तु का ज्ञान दर्शनपूर्वक होता है । किन्तु श्रुत (आगम) से होने वाला पदार्थ-ज्ञान दर्शनपूर्वक नहीं होता । अतः शास्त्र की इस मर्यादा को ध्यान में रखकर दर्शनोपयोग की स्वतन्त्र सिद्धि हेतु इस गाथा में कहा गया है कि यदि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान इन दोनों में से किसी एक के पहले दर्शन का होना न माना जाए, तो फिर दर्शन कब और कैसे हो सकता है ?