+ मन:पर्यय ज्ञान में मन:पर्यय दर्शन का प्रसंग नहीं -
मणपज्जवणाणं दंसणं ति तेणेह होइ ण य जुत्तं ।
भण्णइ णाणं णोइंदियम्मि ण घडादयो जम्हा ॥26॥
अन्वयार्थ : [तेणेह] इसलिए (यहाँ व्याख्या के अनुसार प्रसंगतः) [मणपज्जवणाणं] मन:पर्ययज्ञान को [दंसणं] दर्शन मानना पड़ेगा [ति] यह [ण] नहीं [होइ] होता है [य] और [जुत्त] युक्‍त [भण्णइ] कहा जाता है [जम्हा] जिससे [घडादओ] घट आदि [णोइंदियम्मि] नोइन्द्रिय (मन) के विषय में [णाणं] ज्ञान (मन:पर्यय) प्रवर्तमान [ण] नहीं होता है ।
Meaning : According to the aforesaid definition Manahparyaya is Darsana ; but it is not so. It is laid down that proper province of this knowledge is Mind which is technically called No-indriya. The jars etc. are excluded from its sphere.

  विशेष 

विशेष :

दर्शन शब्द की उक्त व्याख्या के अनुसार मन:पर्यय ज्ञान को मन:पर्यय दर्शन रूप मानने का प्रसंग प्राप्त हो जाता है, किन्तु मनःपर्यय दर्शन नहीं माना गया है । इसका कारण यह है कि परकीय मनस्थित मनोवर्गंणा रूप मन को मन:पर्ययज्ञान विषय करता है। अतः मन के साथ अस्पृष्ट जो घट आदि हैं, वे इसके विषय नहीं हैं, उनका विषय तो अनुमान है । इस प्रकार मन:पर्यय ज्ञान रूप ही होता है; दर्शन रूप नहीं ।