
विशेष :
दर्शन शब्द की उक्त व्याख्या के अनुसार मन:पर्यय ज्ञान को मन:पर्यय दर्शन रूप मानने का प्रसंग प्राप्त हो जाता है, किन्तु मनःपर्यय दर्शन नहीं माना गया है । इसका कारण यह है कि परकीय मनस्थित मनोवर्गंणा रूप मन को मन:पर्ययज्ञान विषय करता है। अतः मन के साथ अस्पृष्ट जो घट आदि हैं, वे इसके विषय नहीं हैं, उनका विषय तो अनुमान है । इस प्रकार मन:पर्यय ज्ञान रूप ही होता है; दर्शन रूप नहीं । |