+ युगपत्‌ अनन्तदर्शन ज्ञानयुक्त स्वसमय -
साई अपज्जवसियं ति दो वि ते ससमयओ हवइ एवं ।
परतित्थयवत्तव्वं च एगसमयंतरुप्पाओ ॥31॥
अन्वयार्थ : [ते] वे (दोनों - केवलदर्शन, केवलज्ञान) [दो वि] दोनों ही [साई] सादि, [अपज्जवसियं] अपर्यवसित (बदलते रहते हैं) [च] और [एगसमयंतरुप्पाओ] (दोनों) एक समय के अन्तर से उत्पन्न होते हैं [एवं] इस प्रकार [ससमयओ] स्वसमय (परमात्मा) [हवइ] होता है [परतित्थयवत्तव्वं] अन्य मत का वक्‍तव्य है ।
Meaning : According to real Jaina doctrines both Gyana and Darsana have a beginning but no end. This being the case a doctrine which formulates that there is an interval of one Samaya between the productions of both of them should not be accepted as a real Jaina Doctrine.

  विशेष