+ एक बार होने पर केवलज्ञान सतत -
केवलणाणं साई अपज्जवसियं ति दाइयं सुत्ते ।
तेत्तियमित्तोत्तूणा केइ विसेसं ण इच्छंति ॥34॥
जे संघयणाईया भवत्थकेवलिविसेसपज्जाया ।
ते सिज्ज्ञमाणसमये ण होंति विगयं तओ होइ ॥35॥
सिद्धत्तणेण य पुणो उप्पण्णो एस अत्थपज्जाओ ।
केवलभावं तु पडुच्च केवलं दाइयं सुत्ते ॥36॥
अन्वयार्थ : [केवलणाणं] केवलज्ञान [साई] सादि [अपज्जवसियं] अपर्यवसित (परिवर्तनशील) है [त्ति] यह [सुत्ते] सूत्र में [दाइयं] दर्शाया गया है [तेत्तियमित्तोत्तूणा] उतने मात्र से गर्वित [केइ] कुछ [विसेसं] विशेष (केवल ज्ञान को पर्यवसित) को [ण] नहीं [इच्छंति] चाहते (मानते) हैं ।
[भवत्थकेवलि] भवस्थ केवली की [विसेसपज्जाया] विशेष पर्यायें संहनन आदि रूप [जे] जो [संघयणाईया] संहनन आदि हैं [तै] वे [सिज्ममाणसमये] सिद्ध होने के समय में [ण] नहीं [होंति] होती [तओ] इस कारण [विगयं] विगत (पर्यवसित) [होइ] होती है ।
[एस] यह (केवलज्ञान रूप) [अत्थपज्जाओ] अर्थपर्याय [सिद्धत्तणेण] सिद्धत्व रूप से [य] और [पुणो] फिर [उप्पण्णो] उत्पन्न होती है [केवलभावं] केवलभाव की [पडुच्च] अपेक्षा से [केवलं] केवलज्ञान को (सादि अपर्यवसित) [सुत्ते] सूत्र में [दांइयं] दिखाया गया है ।
Meaning : Some do not recognize Visesa which means a modificatory change because they have become reckless on account of the sutra which is to the effect that perfect knowledge is without an end but not without a beginning.
Those particular conditions such as bodily frame etc. which exist in a perfect being -- Kevali who is still not a Siddha do not remain as entities when he attains Siddhatva. It means, then, Kevala is destroyed.
Moreover, this Artha-paryaya, which is just like absolute knowledge, comes into being in the form of Siddhatva. With reference to Kevala-Bhava the sutra declares that it is without an end.

  विशेष