+ प्रस्तुत वार्ता का प्रयोजन -
सीसमईविप्फारणमेत्तत्थोऽयं को समुल्लावो ।
इहरा कहामुहं चेव णत्थि एवं ससमयम्मि ॥25॥
ण वि अस्थि अण्णवादो ण वि तव्वाओ जिणोवएसम्मि ।
तं चेव य मण्णंता अवमण्णंता ण याणंति ॥26॥
अन्वयार्थ : [सीसमई] शिष्य (जनों की) बुद्धि (को) [विप्फारण] विकसित करने [मेत्तत्थोऽयं] मात्र प्रयोजन (से) यह [समुल्लावो] प्रबन्ध (कथा वार्ता) [कओ] किया गया है [इहरा] अन्यथा [ससमयम्मि] जिन-शासन में [एवं] इस प्रकार (की) [कहामुहं] कथा आरम्भ (का अवकाश) [चेव] ही [णत्थि] नहीं है ।
[जिणोवएसस्मि] जिन ( भगवान्‌ के) उपदेश में [अण्णवादो] अन्य भेदवाद (मत) [ण वि] नहीं ही [अत्यि] है [ण वि] नहीं (ही) [तव्वाओ] वह (अभेद) वाद [तं] उसे (भेद या अभद को) [चेव य] ही जो [मण्णंता] मानने वाले (हैं वे) [अमण्णंता] नहीं मानते हुए [ण] (कुछ भी) नहीं [याणंति] जानते हैं ।
Meaning : The digression in discussing things that do not form our subject matter is for the sake of sharpening the intellectual powers of the disciples. There is really speaking no room for all these discussions in Jaina Sastra.
Both the views of absolute difference and absolute identity, are not admitted by Jaina Sastra, Persons holding both these extreme views, not knowing the real nature of things, are totally ignorant.

  विशेष 

विशेष :

यहाँ पर गुण-गुणी के भेद तथा अभेद विषयक जो विचार प्रस्तुत किया गया है, वह सब शिष्यों की बुद्धि को विकसित करने के उद्देश्य से ही किया गया है । वास्तव में जिनेन्द्र भगवान्‌ के शासन में भेद या अभेद किसी एक प्रकार की कथा (वार्ता) नहीं है। जैन शासन अनेकान्तात्मक है। अत: इसमें एकान्त रूप से भेदवाद तथा एकान्त रूप से अभेदवाद की स्थिति नहीं है ।

और फिर, जिनेन्द्र भगवान्‌ के उपदेश में न तो सर्वथा भेदवाद है और न सर्वथा अभेदवाद है । जो इन दोनो में से भेदबाद या अभेदवाद को मानने वाले हैं, वे भेद या अभेद को मानते हुए भी जिनशासन को नहीं मानते हैं ।