+ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य लक्षण-विचार -
दव्वस्स ठिई जम्म-विगमा य गुणलक्खणं ति वत्त्व्वं ।
एवं सइ केवलिणो जुज्जइ तं णो उ दवियस्स ॥23॥
दव्वत्थंतरभूया मुत्ताऽमुत्ता य ते गुणा होज्ज ।
जइ मुत्ता परमाणू णत्थि अमुत्तेसु अग्गहणं ॥24॥
अन्वयार्थ : [दव्वस्स] द्रव्य का (लक्षण ) [ठिई] स्थिति (ध्रौव्य) [जम्मविगमा] उत्पत्ति [य] और विनाश [गुणलक्खणं] गुण (पर्याय का) लक्षण (है) [ति] यह (ऐसा) [वत्त्व्वं] कहना चाहिए [एवं] इस प्रकार [सइ] होने पर (मान लेने से) [तं] वह (लक्षण ) [केवलिणो] केवल [दवियस्स] द्रव्य का (तथा केवल गुण का) [जुज्जइ] घटता है [उ] किन्तु [दवियस्स] द्रव्य का अखण्ड वस्तु का [णो] नहीं ।
[दव्वत्थंतरभूया] द्रव्वान्तर (को) प्राप्त [ते] वे [गुणा] गुण [मुत्तामुत्ता] मूर्त [य] और अमूर्त [होज्जा] होंगे [जइ] यदि [मुत्ता] मूर्त हों तो कोई परमाणु [णत्यि] नहीं है (होगा) [अमृत्तेसु] अमूर्त होने पर [अग्गहणं] परमाणु ग्रहण नहीं होंगे ।
Meaning : According to the view of absolute difference between substance and quality a substance is that which has a permanent state and a quality is that which is produced and which perishes. But the author objects to these definitions of substance and quality and says that the definitions would have been proper if substance would have been altogether different from quality and if quality would have been absolutely different from substance. But they cannot be applied to a substance and quality in one.
If qualities are regarded as absolutely different from a substance they are either corporeal (Murta) or incorporeal (Amurta). If they are corporeal then Paramanu (an atom) which is a substance and in which qualities are said to reside will also be corporeal for it is a repository of corporeal things. But the universally accepted characteristics of an atom is that it is incorporeal; while on the other hand qualities are regarded as incorporeal then they will never be known.

  विशेष 

विशेष :

द्रव्य और पर्याय में भेद मानने वाले वादी का यह कथन है कि नित्यता या धौव्य द्रव्य का लक्षण है और उत्पत्ति एवं विनाश गुण अथवा पर्याय का लक्षण है। इस प्रकार से इन दोनों को विभक्त समझना चाहिए । इस विचार के विपक्ष में सिद्धान्तवादी यह कहता है कि इस तरह का विभाजन युक्तियुक्त नहीं है। क्योंकि आचार्य उमास्वामी ने त्त्वार्थसृत्र में यह समझाया है कि द्रव्य का लक्षण 'सत्‌' है। 'सत्' उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य युक्त है। इनमें से द्रव्य के बिना पर्याय का कोई अस्तित्व नहीं है और पर्याय के बिना द्रव्य पृथक्‌ रूप से 'सत्‌' नहीं है। यदि द्रव्य को सर्वथा नित्य माना जाए, तो उसमें कूटस्थ नित्यता माननी होगी । अतः: द्रव्य परिणामी नित्य सिद्ध नहीं होगा । इससे वस्तु क्रिया-शून्य होने से 'असत्‌' सिद्ध होगी। अतएव न तो पर्याय एकान्त रूप से अनित्य है और न द्रव्य ही नित्य है। परन्तु दोनों कथंचित्‌ नित्यानित्यात्मक हैं । इसलिए एकान्त रूप से किसी (द्रव्य) को नित्य और किसी (पर्याय) को अनित्य मानना उचित नहीं है ।

भेदवादी को समझाते हुए कहते हैं कि यदि पर्यायों को द्रव्य से भिन्न माना जाए तो वे गुण रूप पर्यायें द्रव्य से भिन्‍न रह कर मूर्त होंगी या अमूर्त ? यदि आप यह कहते हैं कि द्रव्य की पर्यायें द्रव्य से सर्वथा भिन्‍न रहेंगी तो ऐसी स्थिति में परमाणु का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि परमाणु इन्द्रिय-ग्राह्य नहीं है। उनका अस्तित्व तो द्वयणुकादि पर्यायों से ही जाता जाता है। जैसे ये पर्यायें अन्य द्रव्य से भिन्‍न हैं तथा द्रव्य के अस्तित्व की ज्ञापक नहीं हैं, उसी प्रकार परमाणु से भिन्‍न द्वयणुकादि पर्यायें भी परमाणु की ज्ञापक कैसे हो सकती हैं । इसी प्रकार अन्यथानुपपत्ति रूप अनुमान से परमाणुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता । क्‍योंकि परमाणु हैं जिनमें घट, पट आदि कार्य से भिन्‍न उपपत्ति नही देखी जाती है, इस अनुमान से उन दोनों में कथंचित्‌ अभिन्‍नता ही सिद्ध होती है। अतएवं सभी प्रकार के दोषों से बचने के लिए द्रव्य तथा पर्यायों को परस्पर कथंचित्‌ सापेक्ष एवं अभिन्‍न मानना चाहिये ।