
गइपरिगयं गई चेव केइ णियमेण दवियमिच्छंति ।
तं पि य उड्ढ़गईयं तहा गई अन्नहा अगई ॥29॥
गुणणिव्वत्तियसण्णा एवं दहणादओ वि दट्ठव्वा ।
जं तु जहा पडिसिद्धं दव्वमदव्वं तहा होइ ॥30॥
कुंभो ण जीवदवियं जीवो वि ण होइ कुंभदवियं ति ।
तम्हा दो वि अदवियं अण्णोण्णविसेसिया होंति ॥31॥
अन्वयार्थ : [केइ] कोइ [णियमेण] नियम से [गइ परिणयं] गति परिणत [दवियं] द्रव्य को [गई] गति [चेव] ही [इच्छंति] मानते हैं [तं पि य] और वह भी [उड्ढगईयं] ऊर्ध्व गति वाला [तहा] तथा [गई] गति [अण्णहा अगई] अन्यथा अगति है।
[एवं] इस प्रकार [गुणणिव्वत्तियसण्णा] गुण सिद्ध संज्ञा [दहणादओ] दहन आदि [वि] भी [दट्ठव्वा] समझना चाहिए [जं तु] जो तो [जहा] जिस प्रकार से [पडिसिद्धं] निषिद्ध [दव्वं] द्रव्य [तहा] वैसे [अदव्वं] पदार्थ नहीं [होइ] होता है ।
[कुंभो जीवदवियं ण] घड़ा जीव द्रव्य नहीं है [जीवो वि ण होइ कुंभदवियं ति] जीव द्रव्य भी घड़ा नहीं होता [तम्हा] इससे [दो वि] दोनों ही [अण्णोण्णविसेसिया] एक-दूसरे के गुणों से भिन्न [अदवियं] अद्रव्य [होंति] हैं ।
Meaning : Some regard a thing moving upwards as decidedly full of motion. But though it is in motion from the standpoint of going up, it is also not in motion considering that it does not move downwards.
Similarly fire is fire because it burns. Dahana means one that burns i.e. fire. But in some cases fire cannot burn things that cannot, by their very nature, be burnt. Thus fire both burns and does not burn.
From the standpoint of a mere substance a jar does exist, but from the standpoint of sentient thing it does not exist. Similarly a sentient thing is not a thing from the standpoint of a jar.
विशेष
विशेष :
कोई ऐसा मानते है कि जो द्रव्य गति क्रिया में परिणत होता है, वही गति वाला है जैसे -- अग्नि लकड़ी, कागज, कपड़ा आदि वस्तुओं को जलाने रूप क्रिया करती है, तो उसे अग्नि कहते हैं। इसी प्रकार वस्त्रादि को उड़ाने के कारण तथा स्वयं बहने से पवन वायु कही जाती है। परन्तु अग्नि, पवन आदि में न तो चैतन्य को और न किसी अमूर्तिक पदार्थ को जलाने की क्षमता है। इसलिए अग्नि किसी अपेक्षा से दाहक द्रव्य हैं और किसी अपेक्षा से दहन रूप द्रव्य नहीं भी है । परन्तु एकान्त मत वाला ऐसा मानता है कि जो द्रव्य ऊपर की ओर जाता है, वह गति वाला है अन्य गति वाले नहीं हैं। इससे यह अभिप्राय प्रकट होता है कि शब्द (नाम) की व्युत्पत्ति से जो अर्थ निकलता हो, वह पदार्थ उसी रूप वाला है, अन्य कार्य नहीं करता है । अतएवं अन्यथा कार्यशील होने से वह पदार्थ भी नहीं है ।
इसी प्रकार शब्द की व्युत्पत्ति रूप संज्ञा वाले दहन आदि पदार्थों को जानना चाहिए । वे अपने नाम के अनुसार यदि कार्य करते हैं तो पदार्थ हैं, अन्यथा नहीं हैं । क्योंकि द्रव्य भाव से निषिद्ध होने पर अभावात्मक होता है । अत: जो पदार्थ अपना काम नहीं करता है, वह पदार्थ नहीं है ।
जीव द्रव्य के गुणों की अपेक्षा से घड़ा जीव द्रव्य रूप नहीं है । इसी प्रकार जीव भी घड़े के गुणों की अपेक्षा से घट रूप नहीं है । अतएव ये परस्पर एक-दूसरे के गुणों की अपेक्षा से अद्रव्य हैं । किन्तु अनेकान्त की दृष्टि से सामान्यतः दोनों ही द्रव्य हैं। जीव एक चेतन द्रव्य है और घड़ा अचेतन है । दोनों में परस्पर विरोधी धर्म रहते हैं। एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध धर्म पाये जाते हैं । अनेकान्त इनका विरोध न कर समर्थन करता है ।
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