
विशेष :
उत्पाद दो प्रकार का है -- प्रयोगजन्य तथा स्वाभाविक । इनमे में प्रयोगजन्य उत्पाद को समुदायवाद भी कहते हैं, जिसका दूसरा नाम अपरिशुद्ध है । उत्पाद और विनाश केवल प्रयत्नजन्य ही नहीं, अप्रयत्नजन्य भी होते है । जो उत्पाद प्रयत्नजन्य होता है, वह उत्पाद प्रायोगिक कहा जाता है; जैसे - मिट॒टी के घड़े का उत्पन्न होना । घडे की रचना कुम्हार के प्रयत्न से होती है, इसलिए घडे की उत्पत्ति प्रायोगिक कही जाती है । यह अपरिशुद्ध इसलिए कहा गया है कि इस तरह का उत्पाद किसी विशेष द्रव्य के आश्रित नहीं रहता है । यह प्रायोगिक उत्पाद भूर्त व पौद्गलिक द्रव्यों में ही घटता है; अमूर्त द्रव्यों में नही होता । आकाश में उठने वाले मेघ तरह-तरह के रूप धारण करते हैं । मेघों में दृष्टिगोचर होने वाले विभिन्न आकार-प्रकार की कोई रचना करने वाला नही है । इसलिए उनकी रूप-रचना अप्रयत्नजन्य होने से स्वाभाविक उत्पाद रूप मानी जाती है । प्रयत्नजन्य उत्पाद का दूसरा नाम समुदायवाद भी है। बालू-रेत आदि के बिखरे हुए कणों के एकत्र होने पर स्कन्ध रूप रचना को प्रयत्नजन्य समुदाय उत्पाद कहते हैं । स्वाभाविक उत्पाद भी दो प्रकार का है -- समुदायकृत और ऐकत्विक। ऐकत्विक उत्पाद धर्म, अधर्म और आकाश इन तीनों में पर-प्रत्यय निमित्तक होने से अनियत है । स्वाभाविक समुदायकृत उत्पाद किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा उत्पन्न नहीं होता है । किन्तु ऐकत्विक उत्पाद वैयक्तिक कहा जाता है । इसे परसापेक्ष इसलिए कहा गया है कि जब जीव और पुद्गल द्रव्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं, तब धर्म द्रव्य उदासीन कारण रूप से उनकी सहायता करता है । 'अभणियमा' पद से भी यह सूचित होता है कि ये स्वयं जीव और पुद्गल को नहीं चलाते हैं । किन्तु जिस प्रकार पथिक को ठहरने के लिए छाया उदासीन व अप्रेरक निमित्त है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए । उत्पाद की भाँति विनाश भी दो प्रकार का है - प्रायोगिक विनाश और स्वाभाविक विनाश । दूसरे के प्रयत्न से जो विनाश होता है, उसे प्रायोगिक विनाश कहते है; जैसे कि - मुद्गर से घट का विनाश होना । अपने ही प्रयत्न से होने वाले विनाश को स्वाभाविक विनाश कहा जाता है; यथा - मेघों का स्वतः नाश होना । ये दोनों प्रकार के विनाश समुदायविभागमात्र और अर्थान्तरभाव-प्राप्ति के भेद से दो प्रकार के हैं। समदायविभागमात्र का दृष्टान्त है - मुद्गर के आघात से घड़े का फूट जाना, टुकड़े-टुकड़े हो जाना। किन्तु अर्थान्तरभाव-प्राप्ति में एक पर्याय का नाश होने पर किसी नवीन पर्याय की प्राप्ति हो जाती है; जैसे कि स्वर्ण-निर्मित केयूर के विनाश से कुण्डल, हार आदि का निर्माण होना । इसी प्रकार समुदायविभाग मात्र रूप वैस्रसिक (स्वाभाविक) विनाश का दृष्टान्त है: मेघ का बिना प्रयत्न किए बिखर जाना । इसी प्रकार अर्थान्तरभाव-प्राप्ति रूप वैस्रसिक विनाश का दृष्टान्त है: नमक का पानी रूप होना या बर्फ का पिघल कर पानी बन जाना। |