+ ज्ञान-विहीन पर-समय -
जह जह बहुस्सुओ सम्मओ य सिस्सगणसंपरिवुडो य ।
अविणिच्छिओ य समए तह तह सिद्वंतपडिणीओ ॥66॥
चरणकरणप्पहाणा ससमय-परसमयमुक्कवावारा ।
चरण-करणस्स सारं णिच्छयसुद्ध ण याणंति ॥67॥
अन्वयार्थ : [समये] सिद्धान्त में [अविणिच्छिओ] अनिश्चित ( बुद्धि वाला कोई आाचार्य) [जह जह] जैसे-जैसे [बहुस्सुओ] बहुश्रुत (पण्डित) [सम्मगो] माना जाता है [य] और [सिस्सगणसंपरिवुडो] शिष्यवृन्द से घिरता जाता है [तह तह] वैसे-वैसे [सिद्धंतपडिणीओ] सिद्धान्त के प्रतिकूल होता जाता है ।
[चरण-करणप्पहाणा] (बाह्य) आचरण की क्रियाओं को मुख्य (समझने वाले) [ससमय-परसमयमुक्कवावारा] स्व-समय (और) पर-समय के व्यापार (चिन्तन) से मुक्त [चरण-करणस्स] आचरण परिणाम का [सारं] सार [णिच्छयसुद्ध ण याणंति] निश्चय-शुद्ध (आत्मा) को नहीं जानते हैं ।
Meaning : A man, who is not strong in Sastric lore, passes as one who is well-versed, becomes the enemy of the Sastras as much as he is surrounded by the pupils.
Those, who strictly adhere to rules and regulations and who have left of thinking Jaina and non-Jaina doctrines, are people who do not know the fruit of such rules and regulations with Niscaya Drsti (from philosophical point of view).

  विशेष 

विशेष :

जो आचार्य स्व-समय रूप सिद्धान्त नहीं जानते,हैं, परन्तु बहुश्रुत (अनेक शास्त्रों के ज्ञाता) होते हैं, वे मूलतः तत्त्व-निर्णय के अभाव में शिष्य-समूह से घिर जाते हैं और शने:-शने: उनका जीवन सिद्धान्त के प्रतिकूल होता है। अतएव ऐसे आचार्य को सिद्धान्त का शत्रु कहा गया है ।

जो जीव विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभाव वाले शुद्धात्मतत्त्व के सम्यक्‌ श्रद्धान-ज्ञान-चारित रूप निश्चय मोक्ष-मार्ग से निरपेक्ष हो कर केवल व्रत, नियमादि शुभाचरण रूप व्यवहार नय को ही मोक्ष-मार्ग मानते हैं, वे देवलोकादि की क्लेश-परम्परा भोगते हुए संसार में परिभ्रमण करते हैं । परन्तु जो शुद्धात्मानुभूति लक्षण युक्त निश्चय मोक्षमार्गे को मानता है तथा साधन-शक्ति-सम्पन्नता के अभाव में निश्चय-साधक शुभाचरण करते हैं, तो वे सराग सम्यग्दृष्टि परम्परा से मोक्ष प्राप्त करते हैं । परन्तु जो जीव केवल निश्चयनयावलम्बी हैं, वे व्यवहार रूप क्रिया-कर्मकाण्ड को आडम्बर जान कर स्वच्छन्द क्रिया-कर्म-काण्ड को आडम्बर जान कर स्वच्छन्द हो न निश्चयपद पाते हैं और न व्यवहार को ही प्राप्त करते हैं; निश्चयपद पाते हैं और न व्यवहार को ही प्राप्त करते हैं । आचरण का सार परमतत्त्व की उपलब्धि करना है, परमात्मा बनना है । किन्तु शुद्धात्मा को जाने बिना यह जीव मोक्ष-मार्ग का पथिक नहीं बन सकता है । केवल व्रत, नियमादि के परिपालन से शुद्ध आत्मा का अनुभव नहीं हो सकता है । जो शुद्ध आत्मा को आगम से जान कर उसका चिन्तन-मनन, अनुभव तथा अभ्यास करते हैं, वे ही निश्चय शुद्ध आत्मा को जान सकते हैं ।