
विशेष :
जो आचार्य स्व-समय रूप सिद्धान्त नहीं जानते,हैं, परन्तु बहुश्रुत (अनेक शास्त्रों के ज्ञाता) होते हैं, वे मूलतः तत्त्व-निर्णय के अभाव में शिष्य-समूह से घिर जाते हैं और शने:-शने: उनका जीवन सिद्धान्त के प्रतिकूल होता है। अतएव ऐसे आचार्य को सिद्धान्त का शत्रु कहा गया है । जो जीव विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभाव वाले शुद्धात्मतत्त्व के सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान-चारित रूप निश्चय मोक्ष-मार्ग से निरपेक्ष हो कर केवल व्रत, नियमादि शुभाचरण रूप व्यवहार नय को ही मोक्ष-मार्ग मानते हैं, वे देवलोकादि की क्लेश-परम्परा भोगते हुए संसार में परिभ्रमण करते हैं । परन्तु जो शुद्धात्मानुभूति लक्षण युक्त निश्चय मोक्षमार्गे को मानता है तथा साधन-शक्ति-सम्पन्नता के अभाव में निश्चय-साधक शुभाचरण करते हैं, तो वे सराग सम्यग्दृष्टि परम्परा से मोक्ष प्राप्त करते हैं । परन्तु जो जीव केवल निश्चयनयावलम्बी हैं, वे व्यवहार रूप क्रिया-कर्मकाण्ड को आडम्बर जान कर स्वच्छन्द क्रिया-कर्म-काण्ड को आडम्बर जान कर स्वच्छन्द हो न निश्चयपद पाते हैं और न व्यवहार को ही प्राप्त करते हैं; निश्चयपद पाते हैं और न व्यवहार को ही प्राप्त करते हैं । आचरण का सार परमतत्त्व की उपलब्धि करना है, परमात्मा बनना है । किन्तु शुद्धात्मा को जाने बिना यह जीव मोक्ष-मार्ग का पथिक नहीं बन सकता है । केवल व्रत, नियमादि के परिपालन से शुद्ध आत्मा का अनुभव नहीं हो सकता है । जो शुद्ध आत्मा को आगम से जान कर उसका चिन्तन-मनन, अनुभव तथा अभ्यास करते हैं, वे ही निश्चय शुद्ध आत्मा को जान सकते हैं । |