
विशेष :
पदार्थ को समझाने के लिए सूत्र कहे गए हैं। किन्तु सूत्रों को पढ़ लेने मात्र से अर्थ समझ में नहीं आ जाता । हाँ, शब्दार्थ समझ लेते हैं । किन्तु वास्तविक अर्थ-ज्ञान तो नयवाद के प्रयोग से ही प्रकट होता है । वास्तव में अर्थ-ज्ञान दुर्लभ है । यह सहज ही प्राप्त नहीं होता । जो नयों के द्वारा सूत्रों को तथा उनके भावों को सम्यक् रूप से समझते हैं, अनुभव करते हैं, वे ही यथार्थ अर्थ-ज्ञान को उपलब्ध होते हैं । वास्तव में अर्थ का ज्ञान नयवाद पर निर्भर होने से दुर्लभ है । सिद्धान्त की प्ररूपणा तीन प्रकार से की गई है -- शब्द-रूप से, ज्ञान-रूप से और अर्थ-रूप से । जिनागम का वर्णन इन तीनों रूपों में किया गया है । इसमें शब्द से ज्ञान और ज्ञान से अर्थ उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है । यद्यपि अर्थ का स्थान सूत्र है, सूत्र-ज्ञानपूर्वक अर्थ-ज्ञान होता है। परन्तु केवल सूत्र के शब्दार्थ को जान लेने से वास्तविक अर्थ का ज्ञान नहीं हो जाता। अर्थ का ज्ञान तो नयवाद को जानने से होता है। अतएव जिसने सूत्र जान लिया है, उसे नयार्थ भी जानना चाहिए । जिन्हें धर्म का अभ्यास नहीं है, सिद्धान्त का भली-भाँति अर्थ-ज्ञान नही है, ऐसे आचार्य वास्तव में जिन-शासन की विडम्बना करते हैं । |