+ आहार संबंधी -
आहार संबंधी

  विशेष 

विशेष :

साधु के सामान्य नियम



  • भोजन काल में तीन मुहूर्त लगना वह जघन्य आचरण है, दो मुहूर्त लगना वह मध्यम आचरण है, और एक मुहूर्त लगना वह उत्कृष्ट आचरण है। -- मूलाचार

  • साधु उदर के चार भागों में से दो भाग तो व्यंजन सहित भोजन से भरे, तीसरा भाग जल से परिपूर्ण करे और चौथा भाग पवन के विचरण के लिए खाली छोड़े -- मूलाचार-491

  • दातृ जनों को किसी भी प्रकार की बाधा पहुंचाये बिना मुनि कुशल से भ्रमर की तरह आहार लेते हैं। अतः उनकी भिक्षा वृत्ति को भ्रामरीवृत्ति और आहार को भ्रमराहार कहते हैं। -- राजवार्तिक

  • अपने हाथ रूप भाजन कर भीत आदि के आश्रय रहित चार अंगुल के अंतर से समपाद खडे रह कर अपने चरण की भूमि, जूठन पड़ने की भूमि, जिमाने वाले के प्रदेश की भूमि -- ऐसी तीन भूमियों की शुद्धता से आहार ग्रहण करना वह स्थिति-भोजन नामक मूल गुण है। -- मूलाचार

  • शाली धान्य के एक हजार धान्यों का भात बनता है वह सब एक ग्रास होता है। यह प्रकृतिस्थ पुरुष का ग्रास कहा गया है। ऐसे बत्तीस ग्रासों द्वारा प्रकृतिस्थ पुरुष का आहार होता है और अट्ठाईस ग्रासों द्वारा महिला का आहार होता है। प्रकृत में (अवमौदर्य नामक तप के प्रकरण में) इस ग्रास और इस आहार का ग्रहण न कर जो जिसका प्रकृतिस्थ ग्रास और प्रकृतिस्थ आहार है वह लेना चाहिए। कारण कि सबका ग्रास व आहार समान नहीं होता, क्योंकि कितने ही पुरुष एक कुडव प्रमाण चावलों के भात का और कितने ही एक गलस्थ प्रमाण चावलों के भात का आहर करते हैं। -- धवला

  • खाने योग्य पदार्थ की प्राप्ति के लिए अथवा भोजन विषयक इच्छा को प्रगट करने के लिए हुंकारना और ललकारना आदि इशारों को तथा भोजन के पीछे संक्लेश को छोड़ता हुआ, भोजन करनेवाला व्रती श्रावक तप और संयम को बढ़ानेवाले मौन को करे । -- सागार धर्मामृत

  • साधु द्रव्य व भाव दोनों से प्रासुक द्रव्य का भोजन करे। जिसमें-से एकेंद्री जीव निकल गये वह द्रव्य प्रासुक है और जो प्रासुक आहार होनेपर भी "मेरे लिए किया गया है" -- ऐसा चिंतन करे वह भाव से अशुद्ध जानना, तथा चिंतन नहीं करना वह भाव शुद्ध आहार है।





नवधा भक्ति



  • पड़गाहन

  • उच्चासन

  • पाद प्रक्षालन

  • अर्चना / पूजन

  • नमस्कार

  • मन शुद्धि

  • वचन शुद्धि

  • काय शुद्धि

  • आहार-जल शुद्धि





दाता के 7 गुण



  • महापुराण



    • श्रद्धा -- श्रद्धा आस्तिक्य बुद्धिको कहते हैं; आस्तिक्य बुद्धि अर्थात् श्रद्धाके न होनेपर दान देनेमें अनादार हो सकता है।

    • शक्ति -- दान देने में आलस्य नहीं करना

    • भक्ति -- पात्र के गुणों में आदर करना

    • विज्ञान -- दान देने आदि के क्रम का ज्ञान होना

    • अक्षुब्धता -- दान देने की आसक्ति

    • क्षमा -- सहनशीलता होना

    • त्याग -- उत्तम द्रव्य दान में देना



  • राजवार्तिक



    • पात्र में ईर्षा न होना

    • त्याग में विषाद न होना

    • देने की इच्छा करने वाले में तथा देने वालों में या जिसने दान दिया है, सब में प्रीति होना

    • कुशल अभिप्राय

    • प्रत्यक्ष फल की आकांक्षा न करना

    • निदान नहीं करना

    • किसी से विसंवाद नहीं करना







46 आहार दोष



  • दाता संबंधी 16 उद्गम दोष



    • औद्देशिक दोष - संयत को आते देखकर भोजन पकाना प्रारम्भ करना ।



      • जो कोई आयेगा सबको देंगे ऐसे उद्देश से किया अन्न यावानुद्देश है

      • पाखंडी अन्यलिंगी के निमित्त से बना हुआ अन्न समुद्देश है

      • तापस परिव्राजक आदि के बनाया भोजन आदेश है

      • निर्ग्रंथ (दिगंबर ) साधुओं के निमित्त बनाया गया समादेश दोष है



    • अध्यधि दोष - संयमी साधु को आता देख उनको देने के लिए अपने निमित्त चूल्हे पर रखे हुए जल और चावलों में और अधिक जल और चावल मिलाकर फिर पकावे। अथवा जब तक भोजन तैयार न हो, तब तक धर्मप्रश्न के बहाने साधु को रोक रखे, वह अध्यधि दोष है ।

    • पूतिदोष - प्रासुक आहारादिक वस्तु सचित्तादि वस्तु से मिश्रित हो वह पूति दोष है। प्रासुक द्रव्य भी पूतिकर्म से मिला पूतिकर्म कहलाता है। उसके पाँच भेद हैं - चूल्ही (चूल्हा), ओखली, कड़छी, पकाने के बासन तथा गंध युक्त द्रव्य । इन पाँचों मे संकल्प करना कि इन चूलि आदि से पका भोजन जब तक साधु को न दे दें तक तब अन्य किसी को नहीं देंगे। ये ही पाँच आरंभ दोष हैं जो पूति दोष में गर्भित हैं ।

    • मिश्रदोष - प्रासुक तैयार हुआ भोजन अन्य भेषधारियों के साथ तथा गृहस्थों के साथ संयमी साधुओँ को देने का उद्देश्य करे तो मिश्र दोष जानना ।

    • स्थापित दोष - जिस बासन में पकाया था उससे दूसरे भाजन में पके भोजन को रखकर अपने घर में तथा दूसरे के घर में जाकर उस अन्न को रख दे उसे स्थापित दोष जानना ।

    • बलिदोष - यक्ष नागादि देवताओं के लिए जो बलि (पूजन) किया हो उससे शेष रहा भोजन बलिदोष सहित है। अथवा संयमियों के आगमन के लिए जो बलिकर्म (सावद्य पूजन) करे वहाँ भी बलिदोष जानना ।

    • प्राभृतदोष - प्राभृत दोष के दो भेद हैं - बादर और सूक्ष्म। इन दोनों के भी दो-दो भेद हैं - अपकर्षण और उत्कर्षण। काल की हानि का नाम अपकर्षण है, और काल की वृद्धि को उत्कर्षण कहते हैं । दिन, पक्ष, महीना, वर्ष इनको बदल कर जो आहार दान देना वह बादर प्राभृत दोष है। वह बादर दोष उत्कर्षण व अपकर्षण करने से दो प्रकार का है। सूक्ष्म प्रावर्तित दोष भी दो प्रकार का है। पूर्वाह्ण समय व अपराह्ण समय को पलटने से काल को बढ़ाना घटाना रूप है ।

    • प्रादुष्कार दोष - प्रादुष्कार दोष के दो भेद हैं - संक्रमण और प्रकाशन। साधु के आ जाने पर भोजन भाजन आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना संक्रमण है और भाजन को मांजना या दीपक का प्रकाश करना अथवा मंडप का उद्योतन करना आदि प्रकाशन दोष हैं ।

    • क्रीत दोष - क्रीततर दोष के दो भेद हैं - द्रव्य और भाव। हर एक के पुनः दो भेद हैं - स्व व पर। संयमी के भिक्षार्थ प्रवेश करने पर गाय आदि देकर बदले में भोजन लेकर साधु को देना द्रव्य क्रीत है। प्रज्ञप्ति आदि विद्या या चेटकादि मंत्रों के बदले में आहार लेके साधु को देना भावक्रीत दोष है ।

    • प्रामृष्य दोष - साधुओं को आहार कराने के लिए दूसरे से उधार भात आदिक भोजन सामग्री लाकर देना प्रामृष्य दोष है। उसके दो भेद हैं - सवृद्धिक और अवृद्धिक। कर्ज से अधिक देना सवृद्धिक है। जितना कर्ज लिया उतना ही देना अवृद्धिक हैं ।

    • परिवर्त दोष - साधुओं को आहार देने के लिए अपने साठी के चावल आदिक देकर दूसरे से बढिया चावलादिक लेकर साधु को आहार दे वह परिवर्त दोष जानना ।

    • अभिघट दोष - अभिघट दोष के दो भेद हैं - एक देश और सर्वदेश। उसमें भी देशाभिघट के दो भेद हैं - आचिन्न और अनाचिन्न। पंक्तिबद्ध सीधे तीन अथवा सात घरों से आया योग्य भोजन आचिन्न अर्थात् ग्रहण करने योग्य है। और तितर-बितर किन्हीं सात घरों से आया अथवा पंक्तिबद्ध आठवाँ आदि घरों से आया हुआ भोजन अनाचिन्न है अर्थात् ग्रहण करने योग्य नहीं है । सर्वाभिघट दोष के चार भेद हैं - स्वग्राम, परग्राम, स्वदेश और परदेश । पूर्वादि दिशा के मोहल्ले से पश्चिमादि दिशा के मोहल्ले में भोजन ले जाना स्वग्रामाभिघट दोष है। इसी तरह शेष तीन भी जान लेने। इसमें ईर्यापथ का दोष आता है ।

    • उद्भिन्न दोष - मिट्टी लाख आदि से ढका हुआ अथवा नाम की महोर कर चिह्नित जो औषध घी या शक्कर आदि द्रव्य हैं अर्थात् सील बंद पदार्थों को उघाड़कर या खोलकर देना उद्भिन्न दोष है। इसमें चींटी आदि के प्रवेश का दोष लगता है ।

    • मालारोहण दोष - काष्ठ आदि की बनी हुई सीढी अथवा पैड़ी से घर के ऊपर के खनपर चढ़कर वहाँ रखे हुए पूवा लड्डू आदि अन्न को लाकर साधु को देना मालारोहण दोष है। इसमें दाता को विघ्न होता है ।

    • आछेद्य दोष - संयमी साधुओं के भिक्षा के परिश्रम को देख राजा, चोर आदि गृहस्थियों को ऐसा डर दिखाकर ऐसा कहें कि यदि तुम इन साधुओं को भिक्षा नहीं दोगे तो हम तुम्हारा द्रव्य छीन लेंगे ऐसा डर दिखाकर दिया गया आहार वह आछेद्य दोष है ।

    • अनिसृष्ट दोष - अनीशार्थ के दो भेद हैं - ईश्वर और अनीश्वर । दोनों के भी मिलाकर चार भेद हैं। पहला भेद ईश्वर सारक्ष तथा ईश्वर तीन भेद - व्यक्त, अव्यक्त व संघाट। दान का स्वामी देने की इच्छा करे और मंत्री आदि मना करें तो दिया हुआ भी अनीशार्थ है। स्वामी से अन्य जनों का निषेध किया अनीश्वर कहलाता है। वह व्यक्त अर्थात् वृद्ध, अव्यक्त अर्थात् बाल और संघाट अर्थात् दोनों के भेद से तीन प्रकार का है ।



  • पात्र संबंधी 16 उत्पादन दोष



    • धात्री दोष - पोषन करे वह धाय कहलाती है। वह पाँच प्रकार की होती है - स्नान करानेवाली, आभूषण पहनानेवाली, बच्चों को रमानेवाली, दूध पिलानेवली तथा मातावत अपने पास सुलानेवली। इनका उपदेश करके जो साधु भोजन ले तो धात्री दोष युक्त होता है। इससे स्वध्याय का नाश होता है तथा साधु मार्ग मे दूषण लगता है ।

    • दूत दोष - कोई साधु अपने ग्राम से व अपने देश से दूसरे ग्राम में व दूसरे देश में जल के मार्ग नाव में बैठकर व स्थलमार्ग व आकाशमार्ग से होकर जाय। वहाँ पहुँचकर किसी के संदेश को उसके संबंधी से कह दे, फिर भोजन ले तो वह दूत दोष युक्त होता है ।

    • निमित्त दोष - निमित्त ज्ञान के आठ भेद हैं - मसा, तिल आदि व्यंजन, मस्तक आदि अंग, शब्द रूप स्वर, वस्त्रादिक का छेद वा तलवारादि का प्रहार, भूमिविभाग, सूर्यादि ग्रहों का उदय अस्त होना, पद्म चक्रादि लक्षण और स्वप्न। इन अष्टांग निमित्तों से शुभाशुभ कहकर भोजन-लेने से साधु निमित्त दोष युक्त होता है।

    • आजीव दोष - जाति, कुल, चारित्रादि शिल्प तपश्चरण की क्रिया आदि द्वारा अपने को महान् प्रगट करने रूप वचन गृहस्थों को कहकर आहार लेना आजीव दोष है। इसमें बलहीनपना व दीनपना का दोष आता है ।

    • वनीपक दोष - कोई दाता ऐसे पूछे कि कुत्ता, कृपण, भिखारी, असदाचारी, ब्राह्मण, भेषी साधु तथा त्रिदंडी आदि साधु और कौआ इनको आहारादि देने में पुण्य होता है या नहीं? तो उसकी रुचि के अनुकूल ऐसा कहा कि पुण्य ही होता है। फिर भोजन करे तो वनीपक दोष युक्त होता है। इसमें दीनता प्रगट होती है ।

    • चिकित्सा दोष - चिकित्सा शास्त्र के आठ भेद हैं - बालचिकित्सा, शरीरचिकित्सा, रसायन, विषतंत्र, भूततंत्र, क्षारतंत्र शलाकाक्रिया, शल्यचिकित्सा। इनका उपदेश देकर आहार लेने से चिकित्सा दोष होता है ।

    • क्रोधी, मानी, मायी, लोभी दोष - क्रोध से भिक्षा लेना, मान से आहार लेना, माया से आहार लेना, लोभ से आहार लेना, इस प्रकार क्रोध, मान, मायी, लोभ रूप उत्पादन दोष होता है ।

    • पूर्व स्तुति दोष - दातार के आगे 'तुम दानपति हो, यशोधर हो, तुम्हारी कीर्ति लोक प्रसिद्ध हैं' इस प्रकार के वचनों द्वारा उसकी प्रशंसा करके आहार लेना, अथवा दातार यदि भूल गया हो तो उस याद दिलाया कि पहले तो तुम बड़े दानी थे, अब कैसे भूल गये, इस प्रकार प्रशंसा करके आहार लेना पूर्व स्तुति दोष है ।

    • पश्चात् स्तुति दोष - आहार लेकर पीछे जो साधु दाता की प्रशंसा करे, कि तुम प्रसिद्ध दानपति हो, तुम्हारा यश प्रसिद्ध है, ऐसा कहने से पश्चात् स्तुति दोष लगता है ।

    • विद्या दोष - जो साधने से सिद्ध हो वह विद्या है, उसे विद्या की आशा देने से कि हम तुमको विद्या देंगे तथा उस विद्या की महिमा वर्णन करने से जो आहार ले उस साधु के विद्या दोष आता है ।

    • मंत्र दोष - पढने मात्र से जो मंत्र सिद्ध हो वह पठित सिद्ध मंत्र होता है, उस मंत्र की आशा देकर और उसकी महिमा कहकर जो साधु आहार ग्रहण करता है उसके मंत्र दोष होता है ।आहार देनेवाले व्यंतरादि देवों को विद्या तथा मंत्र से बुलाकर साधन करे वह विद्या मंत्र दोष है। अथवा आहार देनेवाले गृहस्थों के देवता को बुलाकर साधना वह भी विद्या मंत्र दोष है ।

    • चूर्ण दोष - नेत्रों का अंजन, भूषण साफ करने का चूर्ण, शरीर की शोभा बढानेवाला चूर्ण - इन चूर्णों की विधि बतलाकर आहार ले वहाँ चूर्ण दोष होता है ।

    • मूल कर्म दोष - जो वश में नहीं है उनको वश में करना, जो स्त्री पुरुष वियुक्त हैं उनका संयोग कराना - ऐसे मंत्र-तंत्र आदि उपाय बतलाकर गृहस्थों से आहार लेना मूलकर्मदोष है।



  • 10 अशन दोष



    • शंकित दोष - अशन, पान, खाद्य व स्वाद्य यह चार प्रकार भोजन आगमानुसार मेरे लेने योग्य है अथवा नहीं ऐसे संदेह सहित आहार को लेना शंकित दोष है ।

    • मृक्षित दोष - चिकने हाथ व पात्र तथा कड़छी से भात आदि भेजन देना मृक्षित दोष है। उसका सदा त्याग करे ।

    • निक्षिप्त दोष - अप्रासुक सचित्त पृथिवी, जल, तेज, हरितकाय, बीजकाय, त्रसकाय, जीवों के ऊपर रखा हुआ आहार इस प्रकार छह भेद वाला निक्षिप्त दोष है ।

    • पिहित दोष - जो आहार अप्रासुक वस्तु से ढँका हो, उसे उघाड़ कर दिया गये आहार को लेना पिहित दोष होता है ।

    • संव्यवहरण दोष - भोजनादि का देन-लेन शीघ्रता से करते हुए, बिना देखे भोजन-पान दे तो उसको लेने में संव्यवहरण दोष होता है ।

    • दायक दोष - जो स्त्री बालक का शृंगार कर रही हो, मदिरा पीने में लंपट हो, रोगी हो, मुरदे को जलाकर आया हो, मूत्रादि करके आया हो, नपुंसक हो, आयु आदि से पीड़ित हो, वस्त्रादि ओढ़े हुए न हो, मूत्रादि करके आया हो, मूर्छा से गिर पड़ा हो, वमन करके आया हो, लोहू सहित हो, दास या दासी हो, अर्जिका रक्तपटिका आदि हो, अंग को मर्दन करने वाली हो, - इन सबों के हाथ से मुनि आहार न लें । अति बालक हो, अधिक बूढी हो, भोजन करती जूठे मुंह हो, पाँच महीना आदि के गर्भ से युक्त हो, अंधी हो, भीत आदि के आँतरे से या सहारे से बैठी हो, ऊँची जगह पर बैठी हो, नीची जगह पर बैठी हो । मूँह से फूंककर अग्नि जलाना, काठ आदि डालकर आग जलाना, काठ को जलाने के लिए सरकाना, राख से अग्नि को ढँकना, जलादि से अग्नि का बुझाना, तथा अन्य भी अग्नि को निर्वातन व घट्टन आदि करने रूप कार्य करते हुए भोजन देना । गोबर आदि से भीति का लीपना, स्नानादि क्रिया करना, दूध पीते बालक को छोड़कर आहार देना, इत्यादि क्रियाओं से युक्त होते हुए आहार दे तो दायक दोष जानना ।

    • उन्मिश्र दोष - मिट्टी, अप्रासुक जल, पान-फूल, फल आदि हरी, जौ, गेहुँ आदि बीज, द्वींद्रियादिक त्रस जीव - इन पाँचों से मिला हुआ आहार देने से उन्मिश्र दोष होता है ।

    • अपरिणत दोष - तिल के धोने का जल, चावल का जल, गरम हो के ठंढा हुआ जल, तुष का जल, हरण चूरण आदि कर भी परिणित न हुआ जल हो वह नहीं ग्रहण करना। ग्रहण करने से अपरिणत दोष आता है ।

    • लिप्त दोष - गेरू, हरताल, खड़िया, मैनशिल, चावल, आदि का चून, कच्चा शाक - इनसे लिप्त हाथ तथा पात्र अथवा अप्रासुक जल से भीँगा हाथ तथा पात्र इन दोनों से भोजन दे तो लिप्त दोष आता है ।

    • त्यक्त दोष - बहुत भोजन को थोड़ा भोजन करे अर्थात् जूठा छोड़ना या बहुत-सा भोजन कर पात्र में-से नीचे गिराता भोजन करे छाछ आदि से झरते हुए हाथ से भोजन करे अथवा किसी एक आहार को (अशन, पान, खाद्य स्वाद्यादि में-से किसी एक को) छोड़कर भोजन करे तो त्यक्त दोष आता है ।



  • संयोजना दोष - ठंडा भोजन गर्म जल से मिलाना अथवा ठंडा जल गर्म भोजन से मिलाना

  • प्रमाण दोष - मात्रा से अधिक भोजन करना

  • अंगार दोष - मूर्च्छित हुआ अति तृष्णा से आहार ग्रहण करना

  • धूम दोष - निंदा अर्थात् ग्लानि करते हुए भोजन करना





मुनि के आहार ग्रहण / त्याग के कारण



  • आहार ग्रहण के 6 कारण



    1. क्षुधा की वेदना के उपशमार्थ

    2. वैयावृत्य करने के लिए

    3. छह आवश्यक क्रिया के अर्थ

    4. तेरह प्रकार चारित्र के लिए

    5. प्राण रक्षा के लिए

    6. उत्तम क्षमादि धर्म के पालन के लिए



  • आहार त्याग के 6 कारण



    1. दुष्ट व्याधि के उत्पन्न हो जाने पर

    2. चारों प्रकार के उपसर्ग आ जाने पर

    3. ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए

    4. इन्द्रियों को शांत करने के लिए

    5. समस्त जीवों की दया पालन करने के लिए

    6. तपश्चरण पालन करने के लिए और समाधि-मरण धारण करने के लिए







14 मल



  • 5 महामल -- इनसे संसक्त आहार का त्याग और प्रायश्चित्त



    1. चमड़ा

    2. हड्डी

    3. रुधिर (खून)

    4. मांस

    5. पीव



  • मध्यम मल, आहार का त्याग और किंचित् प्रायश्चित्त



    1. नख



  • जघन्य मल, आहार का त्याग



    1. त्रस-काय जीवों का शरीर

    2. बाल



  • अल्प-मल, आहार से अलग कर देना अथवा त्याग



    1. कण -- गेहुँ आदि का बाह्य खंड

    2. कुंड -- शाली आदि के सूक्ष्म अभ्यंतर अवयव अथवा बाहर से पक्व और भीतर से अपक्व

    3. फल -- बेर आदि

    4. बीज -- जो उत्पन्न हो सकता है ऐसा गेहुँ आदि

    5. कन्द -- सूरण आदि

    6. मूल -- मूली अदरख आदि







अन्तराय (मूलाचार)



  • 32 अंतराय



    1. साधु के चलते समय वा खड़े रहते समय ऊपर जो कौआ आदि बीट करे तो वह काक नामा भोजन का अंतराय है।

    2. अशुचि वस्तु से चरण लिप्त हो जाना वह अमेध्य अंतराय है।

    3. वमन होना छर्दि है।

    4. भोजन का निषेध करना रोध है।

    5. अपने या दूसरे के लहू निकलता देखना रुधिर है।

    6. दुःख से आँसू निकलते देखना अश्रुपात है।

    7. पैर के नीचे हाथ से स्पर्श करना जान्वधः परामर्श है।

    8. तथा घुटने प्रमाण काठ के ऊपर उलंघ जाना वह जानूपरि व्यतिक्रम अंतराय है।

    9. नाभि से नीचा मस्तक कर निकलना वह नाभ्यधोनिर्गमन है।

    10. त्याग की गयी वस्तु का भक्षण करना प्रत्याख्यातसेवना है।

    11. जीव वध होना जंतुवध है।

    12. कौआ ग्रास ले जाये वह काकादिपिंडहरण है।

    13. पाणिपात्र से पिंड का गिर जाना पाणितः पिंडपतन है।

    14. पाणिपात्र में किसी जंतु का मर जाना पाणित जंतुवध है।

    15. मांस आदि का दिखना मांसादि दर्शन है।

    16. देवादिकृत उपसर्ग का होना उपसर्ग है।

    17. दोनों पैरों के बीच में कोई जीव गिर जाये वह जीवसंपात है।

    18. भोजन देनेवाले के हाथ से भोजन गिर जाना वह भोजनसंपात है।

    19. अपने उदर से मल निकल जाये वह उच्चार है।

    20. मूत्र, शुक्र, अश्मरी (पथरी) निकलना प्रस्रवण है।

    21. चांडालादि अभोज्य के घर में प्रवेश हो जाना अभोज्यगृह प्रवेश है।

    22. मूर्च्छादि से आप गिर जाना पतन है।

    23. बैठ जाना उपवेशन है।

    24. कुत्तादि का काटना संदंश है।

    25. हाथ से भूमि को छूना भूमिस्पर्श है।

    26. कफ आदि मल का फेंकना निष्ठीवन है।

    27. पेट से कृमि अर्थात् कीड़ों का निकलना उदरकृमिनिर्गमन है।

    28. बिना दिया किंचित् ग्रहण करना अदत्तग्रहण है।

    29. अपने व अन्य के तलवार आदि से प्रहार हो तो प्रहार है।

    30. ग्राम जले तो ग्रामदाह है।

    31. पाँव-द्वारा भूमि से कुछ उठा लेना वह पादेन किंचित् ग्रहण है।

    32. हाथ-द्वारा भूमि से कुछ उठाना वह करेण किंचित् ग्रहण है।



  • ये काकादि 32 अंतराय तथा दूसरे भी चांडाल स्पर्शादि, कलह, इष्टमरणादि बहुत से भोजन त्याग के कारण जानना। तथा राजादि का भय होने से, लोकनिंदा होने से, संयम के लिए, वैराग्य के लिए, आहार का त्याग करना चाहिए ।





आहार चर्या की 5 विधि



  1. उदराग्नि शमन -- जितने आहार से उदर की अग्नि शान्त हो जाए उतना ही आहार लेना ।

  2. अक्षम्रक्षण -- जिस प्रकार गाड़ी चलाने के उसकी धुरी पर तेल (ग्रीस) तेल डालते हैं उसी प्रकार शरीर रूपी गाड़ी को मोक्ष नगर पहुँचाने के लिए आहार लेना ।

  3. गोचरी - जैसे गाय के चारा डालने पर गाय की दृष्टि चारे पर रहती है। चारा डालने वाले की सुन्दरता या आभूषण पर नहीं, वैसे ही जिस चर्या में मुनि की दृष्टि आहार पर रहती है, देने वाले के सौन्दर्य, आभूषण, गरीबी, अमीरी पर नहीं ।

  4. श्वभ्रपूरण - जैसे गड्ढे को मिट्टी, कूड़ा-कचरा आदि किसी से भी भरा जाता है वैसे उदर (पेटरूपी गड्डे) को सरस / नीरस चाहे जैसे भी शुद्ध आहार से भर देना ।

  5. भ्रामरी - जैसे भ्रमर फूलों को कष्ट न देते हए रस ग्रहण करता है वैसे ही साधु, गृहस्थ को कष्ट न देते हुए आहार ग्रहण करते हैं ।