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सिद्ध भगवान की स्तुति
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(सवैया एकत्रीसा)
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जो अपनी दुति आप विराजत,
है परधान पदारथ नामी ।
चेतन अंक सदा निकलंक,
महा सुख सागरकौ विसरामी ॥
जीव अजीव जिते जगमैं,
तिनकौ गुन ज्ञायक अंतरजामी ।
सो शिवरुप बसै सिव थानक,
ताहि विलोकि नमैं सिवगामी ॥२॥