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जिनवाणी की स्तुति
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(सवैया तेवीसा)
जोग धरै रहे जगसौं भिन्न,
अनंत गुनातम केवलज्ञानी ।
तासु हृदै-द्रहसौं निकसी,
सरितासम व्है श्रुत-सिंधु समानी ॥
याते अनंत नयातम लच्छन,
सत्य स्वरूप सिधंत बखानी ।
बुद्ध लखै न लखै दुरबुद्ध,
सदा जगमाँहिजगै जिनवानी ॥३॥