+ भेद-विवक्षा -
((कवित्त))
दरसन-ज्ञान-चरन त्रिगुनातम, समलरूप कह्यिे विवहार ।
निहचै-द्रष्टि एकरस चेतन, भेदरहित अविचल अविकार ।
सम्यकदसा प्रमान उभै नय, निर्मल समल एक हीबार ।
यौं समकाल जीवकी परिनति, कहैंजिनेंद गहै गनधार ॥१७॥